GSSSB : परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ क्या कोई आवाज उठाएगा

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कु. लोकेष्णा मिश्रा

मुझे जब यूजीसी नेट का एग्जाम देना होता है, तो हल्द्वानी से नैनीताल ही जाना पड़ता है । आज से 5 साल पहले तो राज्य में होता भी नहीं था । उत्तरप्रदेश या दिल्ली जाना पड़ता था। कम से कम 6 महीने या एक साल की तैयारी फिर 200-250 किमी की दूरी तय करने के साथ ही आर्थिक नुकसान के साथ परेशानी अलग से होती थी। अपनी किसी व्यक्तिगत समस्या के कारण ऐग्जाम न दे सकना या ठीक एग्जाम के समय तक एग्जाम देने न पहुँच सकना ऐसे न जाने कितने कारण ! पर इन सब बातों से इतर जब हमें ये सुनने और देखने को मिलता है कि अमुक एग्जाम में धांधली हुई , बेईमानी हुई वो भी शासन -प्रशासन की नाक के नीचे ? तो इसे क्या कहा जाए ? हर साल या 6 महीने में होने वाली परीक्षा में तो फिर से देने की सम्भावना बनी रहती है पर कुछ परीक्षाएं ऐसी होती हैं, जो 2-4 साल में एक ही बार होतीं हैं और उनके पारदर्शिता पूर्ण न होने से जाने कितने छात्र – छात्राओं का भविष्य अंधकार में विलीन होने लगता है ।
ऐसा ही कुछ पिछले दिनों 17 नवम्बर 2019 को गुजरात की बिन सचिवालय परीक्षा जीएसएसएसबी के बाद हुआ है । लगभग दो साल तक परीक्षा की तिथि आती-जाती रही, परीक्षा की वरीयता 12वीं पास रखी गई कॉल लेटर भी भेज दिए गए फिर पता चला की की केवल स्नातक परिक्षार्थी ही परीक्षा दे सकते हैं । ज्यादा विरोध होने पर एक और निर्णय लिया गया कि आखिरी बार, 12वीं पास दे रहे है अगली बार से स्नातक से कम लोग नहीं दे पाएंगे परीक्षा ।
उसके बाद नियत तिथि पर परीक्षा हुई जिसका समय 12 से 2 बजे तक था, लेकिन कुछ केंद्रों पर यही परीक्षा 3 बजे तक भी चल ही रही थी । कही-कहीं 12:30 पर व्हाट्सएप पर आंसर के स्क्रीनशॉट भी मिले । कहीं-कहीं मोबाइल के साथ एग्जाम दिया जा रहा था ऐसे वीडियो भी दिखने लगे । एक-दो जगह से पेपर लीक होने की सूचना भी आई । कहीं से ऐसी सूचन भी मिली कि पेपर का जो बॉक्स होता है वो परीक्षा केंद्र पर पहले से खुला हुआ मतलब सील टूटा हुआ आया । जिसकी सफाई नए टीचर आए हैं करके दे दी गई । इस सब से परीक्षार्थियों में आक्रोश होना स्वाभाविक था और इसी आक्रोश ने आंदोलन का रूप ले लिया । मुझे इस सब में एक बात बड़ी ही चौकाने वाली लगी कि कहीं किसी अखवार या न्यूज चैनल में इस मामले की सुगबुगाहट तक नहीं आई । सरकार तो सरकार होती है और होना भी चाहिए । उसे सिर्फ मोदी या मनमोहन नहीं बल्कि सामान्य जन की अति आवश्यक आवश्यकताओं को तो अपने संज्ञान में रखना और उनको सुलझाना आना ही चाहिए । स्टूडेंट्स के लीडर युवराज सिंह भी राजनीति का शिकार हो गए नतीजा वो भी स्टूडेंट्स के लिए कुछ नहीं कर पा रहे ! और ये आंदोलन अपने-आप धीमा पडऩे लगा । ऐसे में एक सवाल मौजूं हो गया है कि क्या परीक्षाओं में इसी तरह से धांधली होती रहेगी और छात्रों की आवाज कोई नहीं उठाएगी। यदि उठाएगा तो वह राजनीतिक षडय़ंत्र का शिकार बना लिया जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब परीक्षाओं में जंगलराज कायम हो जाएगा और दबंगों और पैसे वालों को ही नौकरी मिलेगी। वहीं प्रतिभाएं सिर्फ नौकरी के लिए परीक्षा देने के बाद गांवों की पगडंडियों पर ही दम तोड़ देंगी। इसे बचाने के लिए युवाओ को आगे आना चाहिए।

ये लेखक के निजी विचार हैं

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