लोकेष्णा मिश्रा की गजल

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जिंदगी बड़ी लम्बी लगने लगी यारों
छोटी करने का तरीका कोई हो तो कहो ।
यूं तो हम भी थे खुद्दार बहुत अपनों में
वाखुद्दारी फर्ज कहीं निभ सके तो कहो ।
छोड़ दें हम भी इस घर और ज़माने को
खुद से बचने की तरकीब कहीं हो तो कहो ।
हम अपनी साँसे अजीजों को नहीं दे पाते
फिर इससे बड़ा फरेब कोई हो तो कहो ।
गाड़ी ,बंगला ,गहनों का बीमा करने वालो
जांनशीनों की हिफ़ाजतें कर सको तो कहो ।
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