देश में नेत्रदान में मिली हर दूसरी आंख हुई बर्बाद

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नई दिल्ली  ।  देश में 2017-18 में 69 हजार 343 कॉर्निया नेत्रदान में मिले, जिन्हें देशभर के 238 नेत्र बैंकों में सुरक्षित रखा गया। लेकिन नेत्रदान में मिली हर दूसरी आंख (49.5 फीसद) का प्रत्यारोपण में इस्तेमाल नहीं हो पाता है। एम्स सहित देश के 12 बड़े नेत्र बैंकों में नेत्रदान के भंडारण और इस्तेमाल पर हुए अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन को इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी में भी प्रकाशित किया गया है। अध्ययन के मुताबिक अप्रैल 2013 से मार्च 2014 के बीच इन नेत्र बैंकों को 20 हजार 564 कॉर्निया दान में मिले। इनमें से 59.6 फीसद कॉर्निया स्वैच्छिक दान से व 40.4 फीसद कॉर्निया अस्पताल के रिट्रिवल कार्यक्रम के तहत मिले। लेकिन इनमें से 49.5 फीसद कॉर्निया का प्रत्यारोपण में इस्तेमाल नहीं हो सका।

नेत्रदान में पुरुष आगे: स्वैच्छिक नेत्रदान करने वालों में 59.5 फीसद पुरुष व 40.5 फीसद महिलाएं थीं। कुल नेत्र प्रत्यारोपण के 62.1 फीसद लाभार्थी पुरुष थे व 37.9 फीसद महिलाएं थीं। नेत्रदान में आगे, नेत्र प्रत्यारोपण में पीछे : देश में 77.3 फीसद नेत्रदान व्यक्ति की मौत के छह घंटे के भीतर ही हो जाता है। नेत्रदान के लिए यह आदर्श समय है। इसके अलावा 18.1 फीसद नेत्रदान 6 से 12 घंटे के दौरान और शेष नेत्रदान 12 घंटे के बाद होता है। अक्सर नेत्रदान में देरी का बड़ा कारण लंबी कानूनी प्रक्रिया को माना गया है।

नेत्रदान में मिले 50.5 फीसद कॉर्नियां को ही दूसरे मरीजों को प्रत्यारोपित किया जा सका। 49.5 फीसद कॉर्निया का प्रत्यारोपण नहीं हो सका। जिनका इस्तेमाल प्रत्यारोपण में नहीं हुआ उनमें से 58.6 फीसद का इस्तेमाल मेडिकल शिक्षा व 40.6 फीसद का इस्तेमाल शोध में किया गया। इनमें से सिर्फ 2.87 फीसद कॉनिया संक्रमण (सेप्सिस, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, ल्यूकेमिया इत्यादि) की वजह से इस्तेमाल नहीं किए गए।

संरक्षण कमजोर कड़ी:

अध्ययन के मुताबिक 83.33 फीसद नेत्र बैंकों में कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए एमके मीडिया का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा 50 फीसद नेत्र बैंक नम स्टोरेज कक्ष, 33.33 फीसद में ऑप्टिसोल माध्यम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए उन्नत देशों में ऑप्टिसोल माध्यम का इस्तेमाल होता है। इससे कॉर्निया को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। एम्स के आरपी सेंटर के प्रोफेसर डॉ. जेएस तितियाल ने बताया कि हेपेटाइटिस, एचआइवी व सेप्सिस के संक्रमण या डोनर की मौत का कारण स्पष्ट न होने पर कॉर्निया का इस्तेमाल प्रत्यारोपण में नहीं किया जाता। इसके अलावा मौत के 10 से 12 घंटे बाद बाद नेत्रदान होने पर कॉर्निया प्रत्यारोपण के लायक नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि एम्स में जिनता नेत्रदान होता है, उसका 75 से 80 फीसद कॉर्निया प्रत्यारोपण में इस्तेमाल होता है। एम्स का रिकॉर्ड देश में सबसे बेहतर है। एमके (मैकैरी-कॉफमैंस) मीडिया ऐसा माध्यम हैं, जिसमें कॉर्निया 72 घंटे सुरक्षित रहता है। हालांकि, कॉर्निसोल जैसे माध्यम से दो सप्ताह तक कॉर्निया को सुरक्षित रखा जा सकता है। यहां भी इस विधि का इस्तेमाल होने लगा है।

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