जेएनयू में आखिर शिक्षा की जगह क्यों हो रहे अब आंदोलन

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लोकेष्णा मिश्रा

अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बच्चों को शिक्षा और सुविधा देने के लिए बनाई गई जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी अब राजनीति का शिकार होती दिखाई दे रही है। यहां युवा छोटे-छोटे मुद्दों पर आंदोलन कर रहे हैं और शिक्षा से ज्यादा यह सियासत का अखाड़ा बनता जा रहा है। यह बेहद चिंताजनक है आखिर इस एतिहासिक यूनीवर्सिटी इस दलदल से बचाने की जरूरत है। बौद्धिकता और उच्च मानदंडों की शिक्षा वाले इस विश्वविद्यालय में अराजकता को किसी भी कीमत पर समर्थन नहीं दिया जाना चाहिए।
यहां बता दें कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ( जे0 एन0 यू0 ) दक्षिणी दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय है । यहाँ मानविकी , समाज विज्ञान, विज्ञान, अंतराष्ट्रीय अध्ययन आदि विषयों में उच्च स्तर की शिक्षा और शोध कार्य कराए जाते हैं । इस विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद ( नैक ) द्वारा जुलाई 2012 में किए सर्वे से भारत का सबसे अच्छा विश्वविद्यालय कहा गया है । नैक ने विश्वविद्यालय को 4 में से 3.9 ग्रेड दिया जो कि देश के शैक्षिक संस्थान में उच्चतम ग्रेड है ।
इसकी स्थापना 1969 में हुई थी । इसका उद्देश्य जवाहरलाल नेहरू के कार्यों – राष्ट्रीय एकता , सामाजिक न्याय ,धर्म निरपेक्षता , जीवन की पद्धति , अंतराष्ट्रीय समझ एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना निश्चित किया गया । जो नहीं जानते हैं उनको ये भी बता देती हूँ कि जेएनयू की प्रगतिशीलता और शैक्षिक वातावरण के लिए छात्र संघ को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है
यहाँ के कई छात्र संघ सदस्यों ने बाद में भारतीय राजनीति एवं सामाजिक आंदोलनों में मुख्य भूमिका निभाई है । जिनमें प्रकाश करात, सीताराम येचुरी ,डी0 पी0 त्रिपाठी ,आनंद कुमार ,चंद्रशेखर प्रसाद , वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण , सांसद मेनका गाँधी ,नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत मुखर्जी आदि सम्मिलित हैं । यहाँ की छात्र राजनीति पर शुरू से ही वामपंथी छात्र संगठनों ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन ( आइसा ) , स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ( एस0 एफ0 आई 0 ) आदि का वर्चस्व रहा है । वर्तमान में पैनल के सदस्य उग्र वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन से संबंधित हैं । इसके अतिरिक्त जेएनयू शिक्षक संघ भी शुरू से बदलाव की राजनीति के साथ रहा है । इसके वर्तमान अध्यक्ष डॉ0 डी0 के0 लोबियाल हैं ।
यहाँ 28 अक्टूबर को 2019 को नए मैनुअल पास करने के अगले दिन से एक बार फिर विवाद और आंदोलन शुरू हो गया । 4 नवम्बर से छात्र आंदोलन तेज हुआ तो कैम्पस में सीआरपीएफ तैनात करनी पड़ी । 11 नवम्बर को हुए तृतीय दीक्षांत समारोह जिसके मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति वेंकया नायडू और मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के समक्ष भी अपना विरोध जताया । ये विरोध था फीस बढ़ोतरी और ड्रेस कोड को लेकर था। छात्र -छात्राओं के अनुसार काफी समय से ये विवाद चल रहा है पर इसका कोई हल नहीं निकल रहा है । कोई सामने से उनकी बात सुनने या उस पर प्रतिक्रिया करने को नहीं आ रहा था तो उनके आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया और अपनी बात प्रशासन तक ले जाने का प्रयास करने लगे । 13 नवम्बर को विश्वविद्यालय के एक फैसले में छात्रों की माँगों पर कुछ नरमी दिखाई गई और फीस आधी कर दी गई । छात्रों की जो मांग है उनमें ये तीन मांगे प्रमुख हैं। हॉस्टल में कोई सर्विस चार्ज न लगाया जाए , ना ही कोई ड्रेस कोड रखा जाए , आने -जाने के लिए कोई पावंदी ना रखी जाए ।
बजेएनयू प्रशासन कहता है कि कमरों का किरायातीन दशक से नहीं बढ़ा है। बाकी खर्च एक दशक से लम्बे समय से नहीं बढ़ा है। विश्वविद्यालय को करीब 45 करोड़ रूपए का घाटा हो रहा है जबकि पिछले साल पीटीआई में छपी रिपोर्ट की मानें तो हॉस्टल रूम के अलावा बाकी फीस बढ़ी है । पहली माँग के समाधान की बात करें तो ,मानते हैं कि इतने सालों से फीस नहीं बढ़ी पर अचानक से कमरे की फीस 20 रुपए से बढ़ाकर सीधे 600 रुपये करना क्या समझदारी है ? समझदारी तो इसमें ही होगी कि नियमों में संशोधन करके 4 या 5 साल बाद इतने प्रतिशत फीस बढ़ाई जाएगी जैसा कोई प्रावधान रखा जाए । जहाँ तक गरीब छात्र -छात्राओं की बात है तो जिनकी सालाना पारिवारिक आय 12 हजार से कम है उनको ही स्कॉलरशिप और अन्य सुविधाएं देनी चाहिए बाकी अन्य से सामान्य शुल्क का प्रावधान बना देना चाहिए ।
यहाँ एक बात और रखना चाहूंगी कि विश्वविद्यालय स्तर पर आर्थिक रूप से सम्पन्न छात्र – छात्राएं सर्वसुलभ शिक्षा की बात करतीं हैं। वहीँ ये लोग विद्यालय स्तर पर ये बात क्यों अपने ऊपर लागू नहीं करते ? कितने ऐसे हैं जो सरकारी स्कूलों में पढऩा चाहते हैं ? की लाइब्रेरी की जिन पुस्तकों की वहां के छात्र -छात्राएं दम भरते हैं उन पुस्तकों में कितना और कैसा ज्ञान है ये इस बात से पता चलता है कि ये लोग राइट टू एजुकेशन क्या होता है नहीं जानते । उन्हें लगता है कि शिक्षा तो सत्यनाराण के प्रसाद से भी ज्यादा सुलभ है जो आएगा ले कर ही जाएगा ! ( अधिनियम? 6 से 14 साल की उम्र के हरेक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। सरकारी स्कूल सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध करायेंगे और स्कूलों का प्रबंधन स्कूल प्रबंध समितियों (एसएमसी) द्वारा किया जायेगा। ) न कि स्नातक की मंहगी से मंहगी डिग्रियां दिलाएगा ।
यदि किसी को कोई साधन या सुविधा उपलब्ध कराई जाती है तो वह आवश्यक -आवश्यकता की सीमा में कराई जाती है न कि बिना किसी हद के । एक गरीब किसान को अगर जमीन के टुकड़े के साथ उगाने के लिए बीज भी दिया जाएगा तो गेहूं या धान दिया जाएगा न कि केशर और कपूर । कहीं ऐसा तो नहीं कि विभिन्न प्रदेशों के लड़के-लड़कियों के लिए भी स्वतंत्र वातावरण उनकी कमजोरी बन गया है और वो वहाँ अपने जीवन के 6-7 साल अपनी मर्जी से परिवार वालों की बिना रोक-टोक के बिताना चाहते हों मेरी मर्जी के अतिवाद से ग्रसित हो कर जिसे आज का ज्यादातर युवा वर्ग अपना अधिकार बताता है ,बिना ड्रेसकोड या आने-जाने के कोई नियम ना होने पर कितनी अव्यवस्था हो जाएगी ये अपने-अपने साथ कुछ समय के लिए लागू करके देख लेना चाहिए । ये सभी जानते हैं कि कोई भी आंदोलन या रैली बिना पूर्व सूचना एवं धारा 144 के समय नहीं निकाली जा सकती । कहीं ऐसा तो नहीं कि मानवता और समाज या सामाजिकता का सही अर्थ -कर्तव्य भूल कर केवल अधिकारों में में ढूँढा जा रहा है ।
ये सामाजिक समस्याओं का कौनसा वैज्ञानिक दृषिकोण है जो शिक्षकों से अभद्र व्यवहार करने की भी अनुमति दे देता है ? क्या युवाओं के रोल मॉडल स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को अपमानित करना किसी लोकतान्त्रिक पद्धति का हिस्सा है ?
प्रशासन ने परीक्षाओं का बहिष्कार करने वाले छात्रों को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर वे संस्थान के शैक्षणिक मानदंडों पर खरे नहीं उतरे तो अगले सेमेस्टर के लिए रजिस्टर कराने के पात्र नहीं होंगे. विश्वविद्यालय का कहना है कि जेएनयू में छात्रों का मूल्यांकन विभिन्न मानदंडों, जैसे… गृह कार्य, क्विज, टर्म परीक्षाएं, प्रेजेंटेशन, सेशन की परीक्षाओं आदि के आधार पर होता है. प्रशासन का कहना है कि चूंकि प्रदर्शन कर रहे छात्र अन्य छात्रों को भी सेमेस्टर की परीक्षा देने से रोक रहे हैं, ऐसे में उन्हें घर से परीक्षा देने का विकल्प दिया जा रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है, ”विश्वविद्यालय परीक्षाएं लेने की तमाम कोशिशें कर रहा है, जिसमें कि प्रशासन छात्रों से व्हाट्सएप, ई मेल से परीक्षाएं लेने की बात कर रहा है । जेएनयू के छात्रों ने वीसी पर हमला किया , जिसका जेएनयू के कुलपति एम जगदीश कुमार ने शनिवार को दावा किया । दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को इस बात पर ‘हैरानीÓ जतायी कि जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय को उन छात्रों के अकादमिक ब्यौरों की कोई जानकारी नहीं है जिनके खिलाफ उसने अवमानना की याचिका दायर की है.
अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बनाए गए जेएनयू की अवधारणा के केंद्र में उत्कृष्टता ,रचनात्मकता एवं बौद्धिकता की अनवरत तलाश है । इसमें रोमांच , प्रयोगधर्मिता और विषय की तह में जाने की जिद और छटपटाहट है । इसी वजह से यहाँ ऐसे वातावरण का सृजन होता है जिससे समय-समय पर इसका नाम सुखिऱ्यों में ज्यादा रहता है ऐसे प्रश्नों के जवाब किसके दायरे में आते हैं ये विचारणीय तथ्य है ।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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