नासूर बन चुकी इस बीमारी का आखिर कब होगा इलाज

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काजल तिवारी

दोस्तों आज हम समाज की उस बीमारी के बारे में बात करना चाहते हैं, जो अब नासूर बन चुकी है, जी हां साथियों आप सही समझे देश में आज शायद ही ऐसी कोई जगह होगी जहां महिलाएं छेड़छाड़, उत्पीडऩ और दुष्कर्म की शिकार नहीं हो रही हैं। लेकिन हाल ही में घटी दो घटनाओं नें मुझे बहुत ही परेशान किया है। इसमें एक हैदराबाद में पशु चिकित्सक को दुष्कर्म के बाद जलाकर मार डालने की घटना और दूसरी रांची की है। जहां एक युवती के साथ 12 लोगों ने बहशियाना हरकत कर उसे मौत के मुहाने पर पहुंचा दिया है। मैं भी एक लड़की हूं, इसलिए मेरे भी मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह समाज किस ओर बढ़ रहा है। दूसरे की बेटी को अपनी बहन और बेटी मानने की परंपरा वाली हमारी संस्कृति क्या खत्म हो चुकी है। क्या हमारी सरकारें अब बेटियों की सुरक्षा करने में असफल हैं और न्यायालय क्या इन दोषियों को ऐसी सजा नहीं सुना सकता, जिससे इस तरह का अपराध करने की सोचने पर भी इन दरिंदों की रूह कांप जाए। दरअसल मेरा मानना है कि महिलाओं के साथ बढ़ी दुष्कर्म की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह देश की न्याय प्रकिया है, जिसमें अपराधी तो कानून की बारीकियों का सहारा लेकर बच निकलते हैं और जिन पर कानून शिकंजा कस भी देता है, वह लंबी कानून प्रक्रिया के चलते सजा नहीं हो पाने के कारण खुले घूमते रहते हैं। लिहाजा समाज में आपराधिक प्रवृत्ति के इन लोगों के हौसले बढ़ते हैं। युवतियों के साथ बढ़ रही इस तरह की घटनाओं के लिए मैं समाज को भी दोषी मानती हूं। इन अपराधियों को संरक्षण देने वालों से मै पूछना चाहती हंूं कि आखिर एक बलात्कारी किसी का भाई, बेटा या रिश्तेदार कैसे हो सकता है। वह तो समाज के लिए ऐसी बीमारी है जो नासूर बन चुकी है। इसलिए ऐसे लोगों को सजा दिए जाने की प्रक्रिया हम अपने घर से ही शुरू क्यों नहीं कर सकते हैं। अदालत जब न्याय करे तब करती रहे, लेकिन यदि हमारे बीच कोई दरिंदा रह रहा है तो क्यों न उसका समाज से बहिष्कार कर उसे सामाजिक सजा दी जाए। मेरा तो मानना है कि ऐसे लोगों को अंगभंग करके इसी समाज में छोड़ दिया जाए ताकि उसे देखने के बाद इस तरह का अपराध करने का विचार कर रहे लोगों के मन में भी दहशत और डर की भावना पैदा हो। वहीं अदालतों में इस तरह के मामलों की त्वरित और तेज सुनवाई हो ताकि दुष्कर्म के आरोपितों को जल्द ही सजा और समाज को एक सबक मिल सके। वहीं दिल्ली में बैठे अपने प्रतिनिधियों से मेरी अपील है कि संसद में कोई ऐसा कानून लाया जाए जिसमें इस तरह के अपराधियों को हद से हद एक महीने में कठोर से कठोर सजा का प्रावधान किया जाए।

डिस्क्लेमर : यह लेखक के निजी विचार हैं 

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