धर्म की राजनीति के लिए अपने ही देश को आग में झोंकना उचित तो नहीं

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रिषभ चतुर्वेदी

कैब ने एक बार फिर से साबित किया है कि कोई भारत में रहें या पाकिस्तान में… हिन्दू, हिन्दू है और मुसलमान, मुसलमान। बहुत सारे हिन्दू भी मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान, हिन्दू नहीं है। और हाँ! भारत में सबसे अल्पसंख्यक कोई धर्म है तो राष्ट्र धर्म है। भारत में भारतीयों की संख्या हिन्दू, मुस्लिम तो क्या, पारसियों से भी कम है।
कैब पर अभी बवाल मचा हुआ है मगर क्यों? एक देश को क्या पता नहीं होना चाहिए कि उसकी सीमा में कितने नागरिक हैं, कितने शरणार्थी और कितने घुसपैठिए? कितने वैध और कितने अवैध? यदि यह स्पष्ट और व्यवस्थित करने के लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता कानून (कैब) को लागू किया जा रहा है तो दिक्कत क्या है? जाहिर है कि इससे भारतीयों को कोई दिक्कत नहीं है। तो फिर दिक्कत किसे है और क्या?
कैब से दिक्कत है क्षेत्रवाद को, कट्टरवाद को, घुसपैठ को। कैब से किसी भी भारतीय की नागरिकता नहीं जाएगी, यह स्पष्ट है तो फिर भारतीयों को दिक्कत ही क्यों होगी? एक तरह से देखें तो यह नागरिकता कानून भारतीयों के बारे में है ही नहीं। यह पूरी तरह से विदेशियों के बारे में है। शरणार्थियों के बारे में या फिर घुसपैठियों के बारे में। लेकिन, सवाल है कि फिर, देश का एक बड़ा वर्ग बवाल क्यों कर रहा है? खासकर, मुसलमान क्यों परेशान हैं? यह कानून तो यहां के मुसलमानों के भी विरोध में भी नहीं है फिर यहां का मुसलमान क्यों बगावती हो बैठा है? जाहिर है, बाहरी मुसलमानों के लिए। क्योंकि इस कानून में बस यही एक ऐब है कि यह बाहरी मुसलमान को उस नजर से नहीं देख रहा जैसे कि अन्य धर्मों को देख रहा है। जाहिर है कि विरोध करने वाले स्वयं के भारतीय होने से अधिक खुद के प्रान्त या धर्म विशेष का होने को अधिक तवज्जो दे रहे हैं। इसीलिए असम भी बगावती है और मुसलमान भी।
विरोध करने वाले साफ तौर पर विरोध की वजह स्वीकार नहीं कर पा रहे। वह कैब की खामियों को गिनाते हुए इसे संस्कृति पर हमला बता रहे हैं और हकमारी की आशंका जता रहे हैं। हाँ! विरोध की वजह यह भी हो सकती है कि बड़ी संख्या में लोगों के आने से संसाधन बंट जाएगा। बाहरियों के चलते संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन, वास्तव में यह सब वजह है नहीं! इस समय जो बवाल मचा है उसकी वजह यदि यह सब होता तो देश में तो कभी शांति होती ही नहीं, क्योंकि यहां संसाधनों पर संवैधानिक रूप से कमाने वालों से ज्यादा बैठकर खाने वालों का हक पहले से ही रहा है। संविधान में ही कितने सारे हक धार्मिक, जातीय आधार पर दिए गए हैं। संसाधनों पर बराबर हक मिला ही कब और किसे है? वैसे भी जिन्हें नागरिकता दी जानी है, वे सारे लोग पहले से ही वर्षों से भारत में रह रहे हैं। यहीं रोजी-रोजगार कर रहे हैं। यहीं मर-खप रहे हैं। संसाधन का उपभोग तो वह यूँ भी कर ही रहे हैं। वहीं यदि संस्कृति की चिंता होती तो अब तक चिंता में ही हर भारतीय मर चुका होता। पश्चिम से होड़ लेकर देश का युवा वर्ग नंगई पर उतारू है। अय्याशी को आजादी का नाम दिया जा रहा है। महिलाओं से दुष्कर्म के चलते देश शर्मसार है। संस्कृति है कहाँ? और यह बची रहे, इसकी चिंता किसे है? चिंता साफ है और वह चिंता साफ तौर पर अपने धर्म, जाति से जुड़ी हुई है।
नए नागरिकता कानून में यह साफ है कि फलां-फलां धर्म के लोगों को ही नागरिकता प्रदान की जाएगी। इसमें मुसलमान शामिल नहीं हैं। और मुसलमान भी कौन? भारतीय मुसलमान नहीं। बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी मुसलमान। ऐसे में भारतीय मुसलमान कैब का विरोध करते हुए सीधे तौर पर बाहरी हिंदुओं, ईसाइयों आदि धर्मो का विरोध कर रहे हैं या फिर बाहरी मुसलमानों का समर्थन कर रहे हैं। यह आंदोलन बाहरी मुसलमानों को देश में बसाने के लिए है। अभी कैब में मुसलमान को शामिल कर लिया जाए, बवाल खत्म हो जाएगा।
मैंने शुरू में लिखा है कि कैब ने फिर साबित किया है कि बहुत सारे हिन्दू भी मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान, हिन्दू नहीं है… तो यह यूँ ही नहीं कह दिया है। मुसलमान इसलिए सिर्फ मुसलमान है क्योंकि किसी भी मुसलमान ने अन्य धर्मों के लोगों को मिली नागरिकता का स्वागत नहीं किया है। दिल्ली में वर्षों से पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी रहते हैं। अन्य धर्मों के भी कितने लोग हैं। उनमें खुशी है। वे कह रहे हैं कि वे वर्षों से भारत में थे लेकिन अब जाकर उन्हें अपने भारतीय होने का अहसास हो रहा है। मजनूं का टीला पर ऐसे शरणार्थी हजारों की संख्या में हैं। वे खुशी से तिरंगा लहरा रहे हैं लेकिन भारतीय मुसलमानों को यह दिखा क्या? जामिया के छात्रों को पास में ही रहने वाले शरणार्थियों की खुशी क्यों नहीं दिखी जबकि उन्हें दूर-दराज के घुसपैठियों का दर्द परेशान कर गया? इसीलिए मैंने कहा कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान है। वरना मुसलमान चाहता तो अन्य धर्मों को नागरिकता दिए जाने का स्वागत करते हुए अपने धर्म वालों के लिए भी शांतिपूर्ण ढंग से यह अधिकार मांग सकता था लेकिन वह इस कदर मुसलमान है कि वह सीधे नो कैब पर आमादा है। माने कि यदि कैब मुसलमानों के लिए नहीं तो किसी के लिए नहीं इसलिए मैंने कहा कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान है।
मैंने कहा कि बहुत सारे हिन्दू मुसलमान हैं। यह बहुत अच्छी बात है। भारत ऐसे ही हिंदुओं से बचा है जो मुसलमान भी हैं, न कि उनसे जो सिर्फ मुसलमान हैं। एक भी मुसलमान हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान किए जाने पर बधाई नहीं दे रहा। कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं। जबकि तमाम सारे हिन्दू, मुसलमान के लिए सड़क पर हैं कि कैब में उन्हें भी शामिल किया जाए। मेरी जानकारी में ही ऐसे बहुत सारे हैं। मैं नेताओं की बात नहीं कर रहा। उन्हें तो वोट चाहिए इसलिए वे वोट के हिसाब से बोलेंगे लेकिन बहुत सारे आम लोग हैं जो मानवता के हिसाब से बोल रहे हैं। बहुत सारे हिन्दू अपने धर्म से आगे जाकर बोल रहे हैं कि जो हमें मिल रहा है वह मुसलमान को भी मिले लेकिन सब के सब मुसलमान सीधे बोल रहे हैं कि जो हमें नहीं मिला, वह किसी को नहीं मिले- नो कैब। कैब ‘यशÓ हो या ‘नोÓ हो लेकिन इसने तीन बातें स्पष्ट कर दी हैं-
1. हिन्दू, हिन्दू है और मुसलमान, मुसलमान।
2. बहुत सारे हिन्दू भी मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान, हिन्दू नहीं है।
3. भारत में सबसे कमजोर कोई धर्म है तो राष्ट्र धर्म है।
4. भारत में सबसे अल्पसंख्यक कोई है तो भारतीय हैं।
(निहितार्थ : जो मुसलमान या हिन्दू से पहले देश के नागरिक हैं; जिनका धर्म सनातन या इस्लाम से पहले राष्ट्रधर्म है, उन्हें प्रणाम है। जो सिर्फ अपने मजहब के हैं, वे वास्तव में किसी के नहीं हैं, अपने मजहब के भी नहीं। ऐसे कट्टरपंथियों से सावधान रहिए। )

यह लेखक के निजी विचार हैं

 

 

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