अनु दुबे का रवैया कितना उचित

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  • ऋषभ चतुर्वेदी

हैदराबाद की डॉक्टर बेटी से दुष्कर्म और फिर जलाकर मार डालने की घटना वास्तव में बेहद ही अमानवीय और क्रूर है। इस तरह की घटना को लेकर देशभर में जिस तरह का आक्रोश दिखाई दे रहा है वह भी जायज है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में यह आक्रोश उस बेटी को न्याय दिलाने के लिए है या फिर इसके पीछे सियासी मंसूबे भी आकार ले रहे हैं। आखिर अनु दुबे संसद के बाहर पुलिसकर्मियों से उलझकर और फिर मीडिया के सामने रोकर क्या साबित करना चाहती हैं कि देश में महिलाओं के लिए रहने की जगह नहीं बची है या फिर देश का हर युवक बलात्कारी और दुष्कर्मी हो गया है, जिसे संदेह की नजरों से देखा जाना चाहिए। समाज को कौन सी दिशा देेने की यह बात कर रही हैं और उससे भी ज्यादा इस मामले में शर्मनाक रवैया इलेक्ट्रानिक मीडिया का रहा है, जो कि महज टीआरपी के लिए अनु दुबे को इस तरह से हाइप दे रही है, जैसे की वह किसी आजादी की लड़ाई के लिए अंग्रेजों के सामने उतर आई है। मीडिया के इसी रवैये की वजह से आज युवा छोटी-छोटी बातों को लेकर पुलिस-प्रशासन से दंगाइयों की तरह पेश आ रहे हैं। आखिर अन्नू दुबे को संसद के बाहर रोककर पुलिस ने क्या गलत किया था। क्या प्रदर्शन की आड़ में देश की किसी भी महिला या पुरुष को संसद तक जाने देने की इजाजत दी जा सकती है, यदि नहीं तो फिर अन्नू दुबे को रोका जाना गलत कैसे हो गया है। अब बात अगर अन्नू दुबे के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट किए जाने और अभ्रदता की है तो इसकी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि क्या वास्तव में थाने के अंदर वह सबकुछ हुआ जो यह युवती कह रही है और यदि इसमें तनिक भी सच्चाई है तो पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन यदि युवती महज सियासी दलों के हाथ की कठपुतली बनकर देश मेें भूचाल खड़ा करने की कोशिश कर रही है तो उसे भी सख्त सजा हर हाल में दी जानी चाहिए। आखिर संविधान में मिली आजादी का यह तो मतलब कतई नहीं है कि हर व्यक्ति छोटी बड़ी बात पर संसद के अंदर जाकर प्रदर्शन करेगा। संसद की एक मर्यादा है, इसमें जनता की बात रखने के लिए संसद सदस्य हैं। यदि आप किसी बात को लेकर सहमत-अहसमत हैं तो अपनी बात को पत्र, विज्ञप्ति या फिर अब तो सोशल मीडिया भी बेहद कारगर हो चुकी। ऐसे में जनप्रतिनिधियों को शासन प्रशासन के अधिकारियों के माध्यम से अपनी बात संसद तक पहुंचाई जा सकती है। अन्नु दुबे ने मीडिया के सामने एक बात और कहीं कि पुलिस कर्मी उनसे कुछ जानना चाहते थे तो उन्होंने कहा कि मैं बाहर मीडिया के सामने ही बोलूंगी। अब सवाल यह है उठता है कि हमारे देश की पुलिस इतनी न समझ तो है नहीं कि प्रदर्शन कर रही एक युवती से देश की सुरक्षा को खतरा समझ बैठेगी और आतंकी संगठनों से जुुड़े सवाल पूछने लगेगी। जाहिर है कि पुलिस ने यही पूछा होगा कि आप कहां की रहने वाली हैं, किस क्लास और कॉलेज में पढ़ती हैं, आपके माता-पिता क्या करते हैं और आप इस तरह का प्रदर्शन क्यों कर रही हैं। इसमें मुझे तो एक भी ऐसा सवाल नजर नहीं आता है जिसकी जानकारी पुलिस को नहीं दी जा सकती है। हम तो यह मानते हैं कि यह जानकारी तो समाज के हर व्यक्ति को दी जा सकती है, फिर यह अन्नू दुबे क्यों छिपा रही हैं, मीडिया और पुलिस को यह बताने में क्या हर्ज है कि वह किस कॉलेज की छात्रा हैं। वह छात्रा हैं या नहीं यह सच्चाई आज नहीं तो कल सामने आ ही जाएगी, लेकिन फिलहाल अन्नू दुबे के प्रदर्शन से लेकर शाम तक चले घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो कई सवाल उठ रहे हैं। जिसमें एक अहम सवाल यह भी है कि जब राजधानी में प्रदर्शन करने के लिए जंतर-मंतर को निर्धारित किया गया है तो अनु दुबे संसद भवन पर प्रदर्शन करने क्यों जा रही थीं। कहीं ऐसा तो नहीं मीडिया जिसे महज एक घटना से जुड़ा आक्रोश समझकर बढ़ावा दे रही है, वास्तव में वह किसी सियासी दल की सोची समझी रणनीति का हिस्सा रहा हो और इस सबके लिए बकायदा योजना बनाई गई हो। कुल मिलाकर अनु दुबे के प्रदर्शन की सच्चाई क्या है यह तो आने वाला समय ही निर्धारित करेगा, लेकिन उन्होंने जेएनयू और सियासी दलों की मानसिकता वाली परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है, जो न ही देश के लिए उचित कहा जा सकता है और न ही समाज के लिए उचित कहा जा सकता है। इस तरह के प्रदर्शन से सियासी सरगर्मी और इलेक्ट्रानिक मीडिया की टीआरपी बढ़ाए जाने से ज्यादा कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।

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यह ऋषभ चतुर्वेदी के निजी विचार हैं, जो कि एक छात्र हैं।

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