जीने के लिए सोचा ही नहीं !!!!!!!!!!!!!!

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जीने के लिए सबसे जरूरी क्या है ? कभी सोचा है ,ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं 15-20 साल पहले क्या जरूरी रहा होगा बता सकते हैं ?

अच्छा !चलिए जाने दीजिये यही बता दीजिये कि आज फ़रवरी 2020 को आपको क्या सबसे जरूरी लगता है अपनी-अपनी जिंदगी में ,आने वाले 24 घंटों में या कुछ ऐसा कि जिसके बिना लगे कि आप जी ही नहीं सकते उसके खोते या जाते ही आपका भी शरीर “निर्जीव ” हो जायेगा ? कुछ है क्या ऐसा ? क्या कहा ऑक्सीजन? मुझे लगा “प्यार ” कहोगे, मैंने तो “प्यार ” ही सुना,चलो कोई नहीं ।

चलिए दिमाग और विज्ञान से ही सोचते हैं कि ऑक्सीजन ही वो जरूरी बात या वास्तु है जो जीने के लिए सबसे जरूरी है या कुछ और,पर दिक्कत ये है कि ऑक्सीजन ऐसे तो वातावरण में इतनी कम हुई नहीं है कि ,एक अकेले आपको या मुझे ही नहीं मिलेगी जो नहीं भी मिलेगी तो घरवाले कृत्रिम दे देंगे और हम-आप जी उठेंगे । जीवन ना रहने की तो अनंत वजह हैं – अचानक से शुगर कम हो जाये ,या रक्तचाप कम या ज्यादा हो जाए तो उससे भी जीवन नहीं रहे ,ऐसा हो सकता है। ICU जैसे हवा-प्रूफ कमरों के वेंटीलेटर पर तो सब नियंत्रित करके देते हुए भी जीवन “कौनसे शीशे या खिड़की” से निकल जाता है मैं तो आजतक नहीं समझ पाई ।जो तोड़ के निकलता होता तो हर रोज अस्पताल वालों को ICU के शीशे बदलवाने पड़ते, तो फिर क्या किया जाए कैसे पता लगाया जाए कि सच में एक बन्दे-बंदी के लिए सबसे जरूरी क्या है !इसके लिए मैंने अपने कुछ 10-12 नजदीकी मित्रों- रिश्तेदारों से बात की-

ज्यादातर ने पहली जरूरत ऑक्सीजन या सांसे बताईं, किसी ने पैसा ,सरकारी नौकरी ,जिन्दा रहने की इच्छा ,जिन्दा रहने की वजह ,खुद पर भरोसा,सम्मान-शांति ,परिवार ।किसी के लिए मोबाइल चार्जर के साथ अनलिमिटेड डाटा पैक वाला (इसके बिना जिंदगी बेरंग है ),कुछ को अकेले रहने से बुखार आने का खतरा होता है तो आसपास कोई भी चाहिए ।कुछ ने 24 घंटे ही क्या ज्यादातर समय कैरियर को ही देना चाहा है ।एक ने केवल खुशियां चाही हैं । दो-एक तो ये कह के शांत हो गए कि वो समझ ही नहीं पा रहे कि क्या बोलें!

कुछ एक ने बाजार में प्रेम के प्रचार को देख के खुद के भी अरमान जागने की बात तो मानी इन्सटाग्राम की पोस्ट का “अत्याचार ” सहा पर साथ ही ये भी माना कि “अब प्यार करने लायक लोग ” बनते ही नहीं जमीन पर ! एक ने वेलेंटाइन को ध्यान में रखकर प्यार के लिए कोई खास दिन की जरूरत नहीं समझी ,प्यार तो जिंदगी में रहता ही है चाहे जो दिन हो वाली सोच जाहिर की साथ ही काम भी जरूरी है

कुछ गृहस्थ-कामकाजी लोगों ने सबसे जरूरी घर के काम जरूरी बताये, किसी को अपने पतिदेव का बैग पैक करना है कहीं जाने के लिए, किसी को और व्यवस्था देखनी है ।

पर कमाल बात ये है कि ” प्यार “को जगह किसी ने नहीं दी यहाँ तक कि ये भी उत्तर मिला कि सबलोग सबके बिना जी सकते हैं बस ये बात मानना कोई नहीं चाहता जो मान गया उसे किसी की जरूरत नहीं । ये एक स्थिति इतनी आसान नहीं है अच्छे-अच्छे चकरा जाते हैं ” समभाव” रहने में ,नहीं तो प्रेम तो सभी को चाहिए ही “राजा हो या रंक सामाजिक हो या संत ”

तो क्या लोग बताना नहीं चाहते या सच में खुद से भी झूठ बोलते रहते हैं क्या सच में आज के तकनीकी-मशीनी युग में प्यार की वो अहमियत कम हो गई है जिसमें ये कहा जा सके कि – अमुक व्यक्ति का प्यार मेरे लिए सबसे जरूरी है ।ये कोई जरूरी नहीं कि वो “प्रेमी -प्रेमिका” वाला प्यार ही हो ! ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी की वर्तमान में “भावनाओं का बाजार गर्म ” नहीं रहा अगर कुछ है तो वहां अधीरता ज्यादा है ,उतावलापन ज्यादा है । अगर किसी ने “ना “कर दिया तो या तो बदला लेने का मन बना लिया जाता है या फिर खुद को बर्वाद करने की ठान ली जाती है ,पर ये नहीं सोचा जाता कि दूसरे के मना करने के बावजूद भी कौनसा साइंटिफिक-साइक्लोजिकल रीजन है कि आपके शरीर के हार्मोन्स हमेशा उसी को देखकर-सुनकर-महसूस करके असंतुलित क्यों हो जाते हैं ? मानिए तो यही प्यार है फिर चाहे रूप कोई भी हो । आज अगर पिछले 8-10 साल में, मैं कुछ देख सुन रही हूँ तो वो है “रिलेशनशिप ” वही असल में वही फिल्मों में ।फिल्में कहतीं है कि हम लोगो से सीखते हैं और लोग कहते हैं हम फिल्मों से अब जो भी जिससे सीख रहा हो पर है हर जगह सूखापन-रूखापन ही ।

एक उदहारण देना चाहूंगी आपको -कोई लड़का-लड़की हैं स्कूल टाइम से ही प्यार करते हैं एकदूसरे को ।ग्रेजुएशन में आ गए कॉलेज अलग-अलग शहर में हैं दोनों के| लड़का ही आता है हमेशा लड़की से मिलने उसके शहर में हफ्ते दो हफ्ते जैसे भी।सब कुछ बढ़िया चल रहा है एकदम झकास ।अचानक लड़का किसी हादसे में गुजर जाता है । अब बारी लड़की के प्यार निभाने की आती है पता चलते ही लड़की फेसबुक ,व्हाट्सप्प से सारा चैट डिलीट कर देती है लड़के वालों से भी ऐसा ही करने की रिकुएस्ट करती है कानून के घेरे में ना आने के डर से ।उसके बाद कभी पलट के भी उस लड़के के घर के किसी सदस्य से गलती से भी बात नहीं करती ।एक कमाल बात ये कि एक ही शहर में दोनों के परिवार रहते थे पर कभी सांत्वना देने तक नहीं गए । ये है 4-5 साल का प्यार ! ऐसे जाने कितने उदहारण आपसब ने देखे सुने होंगे ।

क्या लगता है आपको कि “उस “लड़की को कुछ नहीं होता होगा कैसा महसूस करती होगी वो ? क्या खुद से अकेले में कभी शर्मिंदगी महसूस होती होगी उसे या नहीं ? या केवल जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए एक पल में सब भूल गई होगी ? तो सच में उसके पास जो अभी तक उसकी यादों में बचा होगा वो उसे कुछ अलग अंदाज में “सम्हाल -सहेज ” सकती थी पर लाइफ में सैटल भी होना है सभी को तो ” ऐसा रिस्क ” क्यों ले कोई ?

तो आज जितना भी रिस्क लेना है वो करिअर बनाने सैटल होने में होता है नहीं तो हिम्मत कर गए तो “शादी ” के दस-पांच साल भी घर से भागना ,जिससे शादी हुई उससे ईमानदारी से ना निभाना प्रेमी या प्रेमिका का जीवन समाप्त कर देना आदि आदि बहुत कुछ ऐसे ही अंदाज ज्यादा हैं प्यार के !!!!!!!!!

हालाँकि 40-50 तक आते-आते हर कोई सच्चा सुकून भावनात्मक जुड़ाव ढूंढने लगता है और उसे वही “छूटा या टूटा प्यार ” बहुत याद आता- सताता है ।

तो भाई ! जमाना चाहे जो हो प्यार तो हमेशा था ,है और रहना ही चाहिए किसी भी रिश्ते में हमेशा । बड़ा सुकून देता है ये अकेले में भी खुश रहने की ताकत देता है ।बीमारियों से लड़ने के लिए एक जरूरी एंटीऑक्सीडेंट है ये ।उसने क्या किया से ज्यादा ये देखो कि हमने क्या किया ।सारे समय मंजिल के ही फेर में मत रहो जीवन चलने का नाम है मंजिल और लक्ष्य तो बदलते ही रहते हैं समय के साथ । 1969 में आई ख़ामोशी फिल्म का एक गाना आपने भी सुना होगा शायद

“हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू

हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो

सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो”

जिसे मिला है उसे खुद को “खुशकिस्मत “तो जरूर समझना चाहिए|

धन्यवाद

जयहिंद !

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