एससी एसटी एक्‍ट पर आए कोर्ट के फैसले के बाद देश में गरमाई दलि‍त राजनीति

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नई दिल्ली  : एससी-एसटी एक्ट के तहत सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद देश के दलित समुदायों में उपजी नाराजगी को सियासी दल 2019 के चुनाव में भुनाने में लग गए हैं। भाजपा के ग्राम स्वराज अभियान की तर्ज पर कांग्रेस ने भी सोमवार से संविधान बचाओ अभियान शुरू किया है। इसका मकसद दलितों पर हो रहे हमलों और अत्याचार को जोरशोर से उठाना है। लेकिन मुहिम के पीछे कांग्रेस की दलित समुदायों में अपनी पैठ बढ़ाने की सियासी मंशा साफ दिखती है।
देश में एससी-एसटी वोटर करीब 17 फीसदी हैं। कुल आबादी करीब 20 करोड़। 150 से ज्यादा संसदीय सीटों पर इस वर्ग का सीधा प्रभाव रहता है। संसद की 131 सीटें इस वर्ग के लिए निर्धारित हैं। इतने बड़े वोट बैंक को रिझाने के लिए हर सियासी दल अपने-अपने तरीके से प्रयास कर रहा है। यही कारण है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल को जब दलित समुदाय सड़क पर उतरा और 13 से ज्यादा राज्यों को हिंसा के हवाले कर दिया तो न कोई सियासी दल इसके विरोध में आया और न ही कोई राज्य सरकार कार्रवाई करती दिखी। कांग्रेस ने दलितों की मांग का समर्थन करते हुए उनकी इस नाराजगी का रुख भाजपा और केंद्र सरकार की ओर करने में लग गई है। इसके लिए कांग्रेस ने संविधान बचाओ अभियान की शुरुआत की है।
इस अभियान के तहत कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता दलित बहुल गांवों में जाकर उनकी समस्याओं को सुनेंगे। उन पर हो रहे जुल्म और अत्याचार को देशभर में जोरशोर से उठाएंगे। यह अभियान डॉ. भीमराव अंबेडकर की अगले साल होने वाली जयंती, 14 अप्रैल तक चलेगा। उस वक्त तक 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रचार शुरू हो चुका होगा और मतदान की तैयारियां हो रही होंगी। कांग्रेस की इस मुहिम की टाइमिंग और तारीख इस बात का इशारा करती है कि संविधान बचाओ अभियान तो महज बहाना है, पार्टी की नजर दलित वोट बैंक पर है। एक दौर में दलित कांग्रेस की जीत का प्रमुख आधार हुआ करते थे। लेकिन 90 के दशक में क्षेत्रीय दलों के उदय के साथ ये राज्यवार अलग-अलग दलों के बीच बंट गए। कांग्रेस दलितों को एकजुट कर फिर से अपने साथ लाने की कोशिश में है।
गुजरात का ऊना कांड हो, यूपी के सहारनपुर की घटना हो या महाराष्ट्र के कोरेगांव की घटना, कांग्रेस लगातार इन मामलों को जोरशोर से उठा रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को इसका फायदा भी मिला। उत्तर प्रदेश में हालांकि दलितों ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया था। दलितों को साथ लाने के लिए कांग्रेस अब अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है। बिहार की तर्ज पर पार्टी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने जा रही है। भाजपा को उसी के दांव से मात देने की रणनीति पर काम कर रही है। यूपी में सपा से उसका गठबंधन है और सपा ने हाल में हुए लोकसभा उपचुनाव से बसपा के साथ भी गठबंधन किया। यूपी में सपा-बसपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन बना रहा तो इसका फायदा उसे भी मिलना तय है।
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