रंग्वाली पिछौड़ा इसलिए है कुमाऊं का विशिष्ट परिधान

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लोकेष्णा मिश्रा, हल्द्वानी

कुमाऊं की दुल्हन के लिए पिछौड़े (Rangwali pichhaura) का वही महत्व है, जो एक विवाहिता के लिए पंजाब में फुलकारी, लद्दाखी महिला के लिए पेराक या फिर एक हैदराबादी के लिए दुपट्टे ,उत्तर-प्रदेश में पचिया और चूनर का है। ये एक शादीशुदा मांगलिक महिला के सुहाग का प्रतीक है । कई परिवारों में इसे विवाह के अवसर पर वधुपक्ष या फिर वर पक्ष द्वारा प्रदान किया जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षों से सुहागिन महिलाओं द्वारा मांगलिक अवसरों पर गहरे पीले रंग की सतह पर लाल रंग से बनी बूटेदार ओढऩी पहनने का प्रचलन है। इस ओढऩी को रंगोली का पिछौड़ा या रंग्वाली का पिछौड़ा कहते हैं। रंग्वाली शब्द रंगोली का अपभ्रंस जो यहाँ की ऐपण कला से प्रभावित है । विवाह, नामकरण, त्यौहार , पूजन-अर्चन जैसे मांगलिक अवसरों पर बिना किसी बंधन के विवाहित महिलायें इसका प्रयोग करती हैं।
उम्र की सीमा से परे रंगवाली पिछौड़ा को कुमाऊं की हर एक महिला,चाहे वो नवयौवना हो, विधवा या फिर बुज़ुर्ग, द्वारा विशिष्ट अवसर पर ओढ़ा जाता है। शादी-शुदा महिलाओं में इस परिधान का एक विशेष अभिप्राय होता है और यह उनकी सम्पन्नता, उर्वरता और पारिवारिक ख़ुशी का प्रतिरूपण करता है7कहते हैं कि दुल्हन तो रंगोली पिछौड़े में निखरती है। तभी तो किसी युवती को शादी के दिन ही पहली बार पिछौड़ा पहनाया जाता है। जानकार बताते हैं कि अतीत में पिछौड़ा दुल्हन को ही पहनाया जाता था। ताकि वह सबसे अलग दिखे। समय के साथ दुल्हन की माँ द्वारा भी शादी के दिन पिछौड़ा पहना जाने लगा7 कुछ शाह और वर्मा परिवार की महिलाएं हाथ से बना पिछौड़ा ही पहनती हैं । पिछौड़ा सनील और मदीन के घाघरे के ऊपर ही जमता है। अब साडिय़ों में भी इसे पहना जाने लगा है। यहाँ की स्थानीय भाषा में इसे घागरी-पिछौड़ा कहते हैं ।रंगवाली पिछौड़ा का प्रचलन सिर्फ और सिर्फ कुमाऊं में ही है 7बाहरी लोगों को ये विशिष्ट परिधान बहुत लुभाता है। हांलाकि वर्तमान में रंगवाली पिछौड़ा के प्रतिरूप पॉवरलूम निर्मित या डुप्लीकेट भी बाजार में उपलब्ध हैं । अब कई परिवार परम्परा के रूप में मंदिर के लिए कपड़े के टुकड़े में शगुन कर लेते हैं। मायके वाले विवाह के अवसर पर अपनी पुत्री को ये पिछौड़ा पहना कर ही विदा करते हैं । सुहागिन महिला की तो अन्तिम यात्रा में भी उस पर पिछौड़ा जरूर डाला जाता है।
लगभग 50 साल पहले तक घर-घर में हाथ से पिछौड़ा रंगने का प्रचलन था।इसके लिये सफ़ेद रंग का तीन या पौने तीन मीटर लम्बा और सवा मीटर तक चौड़ा वाइल या चिकन का कपड़ा लिया जाता था7 हल्दी या किलमोड़े ( एक औषधीय वनस्पति ) की जड़ को पीसकर पीला रंग तैयार किया जाता था7 रंग को पक्का करने के लिये इसमें नीबू भी डाला जाता था7 कपड़े को पीले रंग में रंगने के बाद छाया में सूखने के लिये रखा जाता था7 लाल रंग बनाने के लिये कच्ची हल्दी को पीसा जाता और उसमें नीबू के साथ सुहागा डालकर रात भर के लिये रख दिया जाता7 इसके बाद अगले दिन इसे नीबू के रस के साथ पकाया जाता था7
पारम्परिक पिछौड़े में सबसे पहले बीच के हिस्से पर कुशल महिलाओं द्वारा स्वास्तिक का निशान बनाया जाता और फिर उसके बीच अन्य ज्यामितीय आकारों फूलों या पत्तियों के आकार जैसे चारों खानों में सूर्य, चंद्रमा, शंख और घंटी बनायी जाती है7 पिछौड़ा के मध्यवर्ती भाग में स्थित प्रतीकों के विशिष्ट अभिप्राय होते हैं। स्वास्तिक देवी-देवताओं का प्रतीक होता है जो कि मनुष्य में कर्मयोग की भावना को दर्शाता है जिसकी चारों भुजाएं खुशहाली और सम्पन्नता की द्योतक होती हैं । स्वास्तिक के ठीक मध्य स्थित ओम चैतन्य और आध्यात्मिक अस्तित्व का द्योतक माना जाता है। स्वास्तिक के प्रथम भाग में स्थित सूर्य, पुत्र के सुख और सम्पन्नता को दर्शाता है, द्वितीय वृत्त-खण्ड में स्थित घंटी स्वयं की सम्पन्नता का सूचक होती है तृतीय व चतुर्थ वृत्त-खण्डों (क्वाड्रंट्स) में स्थित शंख व लक्ष्मी क्रमश: धार्मिकता व वैभव का सूचक है। यह रंगाई एक सफ़ेद कपड़े के भीतर चव्वनी ( 25 पैसे ) को लपेट कर की जाती थी7 अन्य आकृति बनाने के लिये खड़ी चवन्नी का प्रयोग किया जाता7 इसके बाद स्वास्तिक के चारों ओर एक श्रृंखला में चवन्नी से ठप्पे लगाये जाते थे7 इस बृहद गूढ़ अवधारणा को चारों ओर से चमकीली किनारी से सुसज्जित किया जाता है। कुछ पारंपरिक पिछौडों में देवी – देवताओं की आकृति भी बनायी जाती हैं7 इसे विवाह से पूर्व गणेश पूजा के दिन गीत संगीत के साथ मिलकर बनाया जाता था7
आज बाजार में एक सामान्य पिछौड़े की कीमत 1200 रुपये है। अमेजन पिछौड़े की ऑनलाइन बिक्री तक कर रहा है लेकिन ये पिछौड़े प्रिंटेड होते हैं। जिनके नाप और प्रिंट कंपनी अपने हिसाब से बनाती है। बाजार में इनकी कीमत आठ से नौ हजार तक भी है। जिनमें अलग -अलग तरीके की कारीगरी की गयी होती है।

सदियों पुरानी है पिछौड़ा की परंपरा
अल्मोड़ा कैंपस में समाजशास्त्र की प्रो. इला शाह बताती हैं कि पिछौड़ा उतना ही पुराना है जितना कि विवाह की परंपरा है। । रंगों में प्रयोग होने वाला बतासा कुमाऊं की मिठास घोलता है।इसे स्कूल की बच्चियों से लेकर कॉलेज की लड़कियां भी विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़े गर्व से पहनती हैं। इसे यहाँ के लोगों द्वारा किसी भी महिला को सम्मान स्वरूप भी प्रदान किया जाता है । पुराना या खऱाब होने पर ये नया भी खऱीदा जा सकता है। जो महिलाएं खरीदने की क्षमता नहीं रखतीं वो अपने सगे- संबंधी का लेकर भी प्रयोग कर सकतीं हैं । पिछौड़ा शब्द से ही परम्परा और लोक पक्ष जुड़ा है। पिछौड़ा पहनने और इसे बनाने का लिखित तौर पर कुछ नहीं है। यह ऐसी परंपरा है जो विरासत में मिली है। बुजुर्ग महिलाओं के सानिध्य में नई पीढ़ी इस कला को सीखती थी। हाथ से बने पिछौड़े अब बहुत कम मिलते हैं। पिछले कुछ समय में एकबार फिर से हाथ से बने पिछौडों की मांग बाजार में है। अल्मोड़ा और बागेश्वर में रहने वाले कुछ परिवार आज भी हाथ से बने पिछौड़े बाजार में बेचते हैं। जिनकी भारी मांग दिल्ली और मुम्बई के बाजारों में भी है।उत्तराखण्ड सरकार अब यहाँ की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने एवं प्रचार-प्रसार की बड़ी अच्छी पहल रोजगार के रूप में करा रही है जिससे कि ये परम्परा अनवरत चलती रहेगी ।

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