नारीवादी ढाल को रखकर पुरुषों से मुकाबला न करें महिलाएं

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लोकेष्णा मिश्रा

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया :।। (56)
यह वचन मनुस्मृति, अध्याय -3 का 56वां श्लोक है । जिसका शाब्दिक अर्थ है – जहाँ स्त्री जाति का आदर -सम्मान होता है , उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ती होती है उस स्थान, परिवार, समाज पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता है और उनके साथ तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहाँ देवकृपा नहीं रहती और संम्पन्न किये कार्य सफल नहीं होते ।
इस श्लोक को वर्तमान अतिआधुनिक युग में भी कुछ महिलाएं एक ढाल या हथियार की तरह प्रयोग में ला रही हैं, अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने एक लेख लिखा था – जिसमें मेरी साथी लेखिका ने उस लेख को ‘न्यूटन के तृतीय नियमÓ के जैसी प्रतिक्रिया देकर अपनी असहमति जताकर इसी श्लोक को दुहराया । मुझे तो अच्छा लगता है जब कोई मेरी बात पर प्रतिक्रिया करता है, क्योंकि उसी से पता चलता है कि सच में कोई आपके लिखे को गहराई से पढ़ रहा है।
हाँ तो मैं बात कर रही थी इस श्लोक की ,इधर एक तरफ तो रिअल के जूस जैसी ताज़ी हवा ये है कि – लडके-लड़कियों में कोई अंतर नहीं , दोनों बराबर मतलब एक-जैसे हैं , तो फिर बस वगैरह में महिला सीट क्यों ? और उस महिला सीट पर बैठे वुजुर्ग तक को एक युवती उठा देने का अपना ‘पेटेंटÓ हक़ समझती है । ठीक उसी तरह जैसे कुछ लोगों को जातियों के आधार पर आरक्षण तो चाहिए पर उनको उनकी जाति के नाम से बुलाना अपराध की श्रेणी में आ जाता है । ऐसे ही जाने कितने उदहारण देखने-सुनने को मिल जायेंगे कहीं ना कहीं , कोई भी श्लोक, कहावत या मुहावरा इत्यादि किसी देशकाल, परिस्थितिवश कहा गया है, जिसका प्रयोग फिर वो चाहे स्त्री हो या पुरुष केवल अपने बचाव के लिए करता है तो इसके प्रभाव उचित न पडऩे के साथ-साथ परिणाम भी अच्छे नहीं हो सकते , फिर भी जिसे जो सही लगता है, वह वही करता है , ये मानव स्वभाव है । ये जरूर कहूंगी कि – बराबरी या एक जैसे रहने की जिन महिलाओं में चाह है, उन्हें ऐसे ‘ नारीवादी Ó ढाल-तलवारों को युद्धक्षेत्र के बाहर ही छोड़ कर मैदान में उतरना चाहिए ।

लेखक के ये निजी विचार हैं।

 

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