लिव इन का जब विरोध नहीं तो वेलेंटाइन का क्यों

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लोकेष्णा मिश्रा, हल्द्वानी

valentine week

रंग नया है रूप नया है
उठे सबके कदम, तरा रम-पम-पम
अजी ऐसे गीत गाया करो
रंग नया है रूप नया है
जीने का तो जाने कहाँ ढंग गया है )- वुजुर्ग लोग
किसे है फि़कर इन्हें क्या पसंद
प्यार के जहाँ में रज़ामंद जब हम तुम तुम हम
बन गए हैं सनम बेधड़क मेरे घर आया करो )- नवयुवक-युवती

ये गाना बातों-बातों फिल्म से है जो 1979 में आई थी मतलब आज से करीब 41 साल पहले । इसमें भी वुजुर्ग महिला उस समय के चलन से खुश नहीं है और नए लोग उनके नाखुश होने की परवाह नहीं करते ,ऐसा दिखाया गया है।
बदलाव हमेशा होता रहा है होता रहेगा । ये विचारणीय है कि कैसा और किस दिशा में हो रहा है। हम ज्यादा समय तक चीजों को अपने हिसाब से नहीं चला सकते । सामान्य तौर पर एक छोटा बच्चा 4-5 साल तक आपकी बात मानता या सुनता है उसके बाद वो धीमी -तेज प्रतिक्रिया शुरू कर देता है । कोई-कोई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो इतनी सी उम्र में भी बात नहीं मानते आप लाख जतन कर लें ।आपके हिसाब से बात चाहे जितनी सही हो !
तो यही मानसिकता ,व्यवहार वर्तमान के युवक-युवतियों की है । उन्हें पढऩे ,नौकरी करने,रहने,शादी करने सभी के लिए तो विदेश ही परफेक्ट लगता हैऔर जो कमी रहती है उसका सारा श्रेय बाजार को जाता है ।बाजार केवल अपने फायदे की सोचता है हर एक के लिए दूसरा उपभोक्ता है कोई मान-ईमान बेचता है ,कोई जिस्म बेचता है, कोई जान बेचता है,कोई दिल बेचता है और भी न जाने क्या-क्या ! दिल से याद आया वेलेंटाइन डे आने को है अब तक ये और वो डे मनाए जा चुके हैं। आज भी बाजार में भरपूर रौनक थी घर से निकलते ही आस-पास की छोटी -मोटी दुकाने वहां लटके छोटे-बड़े दिलों से सुर्ख लाल हुई पड़ीं थीं। आप अगर इनसे कहेंगे आप क्यों ऐसे सामान बेचकर विदेशी संस्कृति को बढ़ावा रहे हैं तो वे वही फायदे वाला रोना लें कर बैठ जायेंगे हम नहीं बेचेंगे तो कोई और बेचेगा तो आखिर जिम्मेदारी कौन उठाए ?
हां विरोध का दिखावा और थोथा विरोध करने वाले तो बहुत हैं फिर उनका चाहे जो नाम रख लीजिए। विरोध प्रदर्शन से पहले वो भी अपनी कथित मेहबूबा को सुर्ख गुलाब या टेडी दे के आए होंगे। कवि और लेखक अपनी कविताओं और लेख के द्वारा मंचतोड़ -कलमतोड़ विरोधी दिखेंगे पर यदि कोई वेलेंटाइन डे पर उनको आमंत्रित करेगा या सम्मानित करेगा तो सब भूल कर दौड़ कर जायेंगे सम्मान लेने -कविता पाठ करने फिर घुमा- फिरा के विदेशी संस्कृति निभाएँगे।
इन्हीं जैसे कुछ लोगों का हिन्दू नूतनवर्ष ज्ञान केवल 31 दिसम्बर और 01 जनवरी को ही जागेगा बाकी के 363 दिन ये सुप्त अवस्था में रहता है उन दिनों कहीं न कहीं से आपको ऐसी कविताएं भेजी जाएँगी जिनके रचनाकारों के नाम स्वयं भेजने वालों को ही पता नहीं होते और वही एक कविता गलत नाम से जाने कितने वॉट्सअप एकाउंट से आपके पास आती रहेगी । तो जैसे राजनीति में एक विपक्ष होता है वैसे ही कुछ, समाज में विपक्ष होता है उसका काम केवल विरोध करना है सुधार करना नहीं। गलती से अगर सुधार हो जाएगा तो सबकी दुकानें बंद हो जाएँगी, सारे मेडिकल स्टोर बंद हो जाएंगे फिर ऐसे लोग कैसे जिन्दा रह पाएंगे कैसे विदेश यात्रा पर जा पाएंगे ? ये बड़ा कठिन सवाल है ।
अगर हम राम और सीता के अटूट,नि:स्वार्थ ,प्रजाप्रेम, शाश्वत प्रेम की बात आज करते हैं तो उसमें बहुत से लोग ढेरों दोष निकाल रहे हैं राम को बेधड़क गलियां सुना रहे हैं ,सीता का कितना शोषण हुआ ये बता रहे हैं ऐसा लगता है जैसे इनदिनों स्वयं सीता जी कहने आईं कि मेरा शोषण हुआ था तब अब इसका बदला तुम राम को जला के और रावण को महापुरुष कह के चुकाओ ।

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राधा-कृष्ण के प्रेम की बात करेंगे तो वो भी बड़ा मुश्किल है कि -जब थोड़े बड़े या एकदूसरे के साथ प्रेमफल चखने लायक हुए तो अलग हो गए । तो आप ही कहिये ऐसा निगोड़ा प्रेम किसे चाहिए ?आज जब साधन-सुविधाएं इतनी हैं कि 6 या 8 क्लास से लेकर ,शादी के बाद भी चाहे कितनी ही बार कैसा भी प्रेम करो ! आधुनिकता और आजादी के नाम पर ,जिसका अभी ताजा उदहारण गुजरात के वो समधी-समधन हैं ,जो अपने ही बच्चों की शादी के दिन से पहले एकसाथ भाग गए थे ऐसे प्रेम का दौर है ये । या मीरा की दीवानगी जैसा प्यार चाहते हैं जिन्हें विरह के अलावा कुछ मिला नहीं प्रेम में, फिर भी उन्होंने उस प्रेम को तजा नहीं उम्र भर।अभी तो वो समय भी आने वाला है जब इस बात के लिए भी कृष्ण को कटघरे में खड़ा किया जायेगा।
आज जब लिविंग रिलेशनशिप जैसी प्रथा को मान्यता मिल गई है तो -रोज -डे, प्रपोज-डे आदि से ले कर वेलेंटाइन -डे भी शांति से मनने दीजिये । हाँ अगर आप में दम है तो अपने परिवार के बच्चों को रोक के रखिये स्वत: ये प्रथा देश से चलती बनेगी । वरना नाहक ही हाय-तौबा मत कीजिये न कराइये । बड़े काम है दुनिया में करने को जिनसे सच में लोगों को थोड़ी चैन की सांस मिलेगी ।

लेखक के ये निजी विचार हैं ।

जय हिन्द !

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