छुआछूत की बीमारी को अब खत्म करने का समय

Must Read

दादी के दम से चौंक गई दुनिया, कोबरा को पूँछ पकड़ कर फेंका

सोशल मीडिया पर वायरल हुई दादी की वीडियो को बहुत पसंद किया जा रहा है| 2 लाख से भी...

1 जून से बदल जाएंगे रेलवे, LPG, राशन कार्ड और विमान सेवा से जुड़े ये 5 नियम

जैसे की हम सभी जानते हैं की चौथा lockdown भी खत्म होने वाला है,और 31 मई को चौथा lockdown...

Mansoon 2020: 1 जून को भारत में दस्तक देगा मानसून, मौसम विभाग ने जताई संभावना

भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि 1 जून को देश के केरल राज्य में दक्षिण...
- Advertisement -
- Advertisement -
- Advertisement -

लोकेष्णा मिश्रा

वो पार्थिव शरीर की शय्या तैयार कर रहा था , हमारे घर से सटे घर के एक बुजुर्ग का देहावसान हो गया था । रामसिंह भुज्जी हाँ इसी नाम से उसे पूरा शहर जानता था , गहरे सांवले हष्ट-पुष्ट शरीर पर सफ़ेद -मटमैले रंग की कपड़े की सिली आधी बाजू व जेब वाली बनियान, पैरों से कुछ ऊंचा कभी चौखाने या सादा सा हल्के रंगों का धुमैला सा तहमद ( लुंगी ), मध्यम आकार के घने-घुँघराले काले-सफ़ेद बाल , कुछ-कुछ डरावनी सी आँखें ( जैसा मुझे लगता था बचपन में ) बहुत ही सीमित हंसने-बोलने वाला अनाज भूनने का काम था उसका ,घर के थोड़े अंदर भाड़ था । बाहर की ओर एक छप्पर और अंदर एक-आध कमरा । दो या तीन बेटी ,एक बेटा । पत्नी भी उसी के डील-डौल की थी । हमारे स्कूल और बाजार के रास्ते में था उसका घर । आबादी वाली मुख्य सड़क के ठीक किनारे अवागढ़ वाले राजा की जमीन मामूली किराये 20-30 रु पर थी । काफी दूर से ही उसके यहाँ भुनते लाई-चने, मटर, मक्के की मिली-जुली गंध नाक के दोनों रास्तों में सरसराती चली जाती। उसके घर के सामने से आते-जाते लोगों के आने-जाने और साथ में नम किये गए अनाजों को सूखते देख, बंदरो की खीं-खीं की आवाजें , रोकते-बचाते भी कुछ मुँह की सेविंग बैंक में कुछ हाथ में ले जाते । किसी-किसी के हाथ से थैला ही ले कर भाग जाते थे बंदर। शायद वो भी भुनते दानों की खुशबू से खुद को रोक नहीं पाते थे ।

कहने को वो सबसे माता जी ,भैया , जीजा ,बहन बोल लेता था पर मेहनताने में किसी से यारी नहीं थी उसकी । काम कराना है तो कराओ नहीं तो जय राम जी की , जो दाम उसने निश्चित किये हैं वही देने पड़ेंगे । घोड़ा घास से यारी करे तो करे , पर वो नहीं करता । कहता था बेटियां हैं इनको विदा भी तो करना है , सो उससे कोई आना-कानी नहीं करता था । मेला-दशहरा पर वो अपना सामान बाजार में भी लाता था बेचने को । अधिकांश लोग उसी से लेते थे , हर किसी को वो ज्यादा भरोसे का लगता था ।
ठिठुरती -ठंडी रात में जब हम रजाई में होते तो वो मूंगफली गरम की आवाज लगाता , न चाहते हुए भी रजाई छोड़ कर हम मूंगफली लेने दौड़ जाते गरम के नाम पर तब हमारे घर में भी ओवन नहीं था ।
शहर भर में दूर-दराज तक कहीं -किसी का भी स्वर्गवास हुआ हो उसे न जाने कैसे -कब खुद नारद जी उसे मेल कर देते हैं ये तो वो ही जाने ! वो किसी के बुलावे का इंतजार नहीं करता था । अमीर हो या गरीब , चाहे जिस जाति का, उसे उससे कोई लेना-देना नहीं , उस दिन वो अपने काम को भी राम जी को सौंप देता । अगर उसे लगता कि पार्थिव शरीर के लिए घर से कंधे कम हैं तो उसका कन्धा आखिरी पड़ाव तक बिना किसी शर्त या थकान के मजबूती से तैयार रहता । अंत्येष्टि के उपरांत ही वह अपने घर को जाता था । उसके बाद उस घर में बुलाने पर भी शायद ही आता कुछ लेने या खाने-पीने के नाम पर ।
ऐसे ही सूरज उगे और ढले ,रामसिंह भी अपनी जिम्मेदारियों से समय से बरी हो गया । उसके बेटे ने किराये का घर छोड़ कर अपना छोटा सा मकान शहर से दूर हट के बना लिया । पत्नी भी साथ छोड़ के स्वर्ग सिधार गई । उसका स्वयं का शरीर भी साथ नहीं दे रहा था अब,इलाज कराने की क्षमता भी सीमित थी । फिर भी बेटा करा ही रहा था इलाज जैसे-तैसे । उसके भी दो बच्चे थे । जहाँ रह रहे थे नए लोग कम ही पहचानते थे उसे । अब वो जमाना भी नहीं था कि- आग मांगने के बहाने किसी के घर के हाल-चल जाने जा सकते थे । घरों में आपस में दूरी भी बहुत थी , सो ये भी पता नहीं चलता था कि एक या आधा किमी वाले घर से चूल्हे का धुंआ उठा या नहीं । बरसात के दिनों में लोग दो -दो , चार-चार दिनों को घरों में ही कैद हो जाते थे कच्चे रास्ते की वजह से । मोबाईल भी उसकी पंहुच से दूर था । बेटियां भी जब-कभी आ कर देख जातीं थीं बीमार पिता को। जिस दिन वो इस दुनिया से गया तब पूरी-रात और दिन आसमान बिना थमे बरसा ! शमशान-घाट तक जाने को चार कंधे नसीब नहीं हुए उसे ।
उसका बेटा दो पहियों की हाथगाड़ी से पिता को अंतिम -यात्रा पर ले कर गया । बताते हैं कि उसको कोई छूत का रोग हो गया था सो लोग उसके मृत शरीर को भी कांधा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए । पर ये आज का भी कसैला सच है कि सोच में अब भी छुआछूत घात लगाए बैठी है किसी न किसी कोने में । आज भी न जाने कितने बदनसीब हैं, जो छुआ छूत की इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही कहा जा सकता है कि दुनिया अब आगे बढ़ चुकी है इसलिए सभी को आगे की ही सोचनी चाहिए और आने वाली पीढ़ी को इस बीमारी से निजात दिलाने के उपाय करने चाहिए।

- Advertisement -
- Advertisement -

Latest News

दादी के दम से चौंक गई दुनिया, कोबरा को पूँछ पकड़ कर फेंका

सोशल मीडिया पर वायरल हुई दादी की वीडियो को बहुत पसंद किया जा रहा है| 2 लाख से भी...

1 जून से बदल जाएंगे रेलवे, LPG, राशन कार्ड और विमान सेवा से जुड़े ये 5 नियम

जैसे की हम सभी जानते हैं की चौथा lockdown भी खत्म होने वाला है,और 31 मई को चौथा lockdown भी खत्म हो जायेगा। ये...

Mansoon 2020: 1 जून को भारत में दस्तक देगा मानसून, मौसम विभाग ने जताई संभावना

भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि 1 जून को देश के केरल राज्य में दक्षिण पश्चिम दिशा से मानसून दस्तक...

आखिर सड़क के बीच कार्तिक आर्यन ने क्यों बदले कपड़े?

लॉक डाउन के दौरान भी कार्तिक अपने फंस से जुड़े हुए हैं| सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों और वीडियो को डालकर वह सुर्खियों में...

अमिताभ बच्चन न अब दान की 20 हजार पीपीई किट, प्रवासियों को भी बसों से किया रवाना

कोरोना वायरस से जंग लड़ रहे देश की साथ बॉलीवुड के कई कलाकार खड़े हो गए हैं । इनमें अक्षय कुमार सोनू सूद सलमान...
- Advertisement -