Bichho ghas : बड़े काम का -बिछुआ

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लोकेष्णा मिश्रा, हल्द्वानी

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होये होये होये

दैय्या रे, दैय्या रे

चढ़ गया पापी बिछुआ

हाय हाय रे मर गयी

कोई उतारो बिछुआ

दैय्या रे दैय्या रे।।।।

कैसो-रे पापी बिछुआ, बिछुआ

फिल्म मधुमती (1958)में वैजयंतीमाला पर ये नृत्य फिल्माया गया था ।समय के साथ और भी कई गीत आए बिछुआ पर लेकिन ईला अरुण द्वारा 1994 में “मैं हो गई सवा लाख की” फिल्म के लिए गाए गीत ने खूब धूम मचाई ।शायद आपने अपने भी सुना हो कभी ——

“बिछुड़ा बिछुड़ा देखो,बिछुड़ा बिछुड़ा देखो

बिछुड़ा बिछुड़ा बिछुड़ा

रे डस गयो पापी बीछुड़ा

रे डस गयो पापी बीछुड़ा ”

मेरी माँ भी बताती थी कि किसी -किसी इंसान को बिच्छू ” चढ़ ” जाता था तो फिर झाड़-फूंक कराई जाती थी । माँ को भी चढ़ जाता था । पर उनको “ततैया ” नहीं चढ़ती थी ।ततैया ने तो अक्सर लोगों को काटा होगा ? भैया की शादी के बाद जब मैं पहली बार कोटाबाग भाभी के पास आई थी तो भाभी ने बताया कि ,उनके स्कूल में बच्चे जब शैतानी या कार्य पूरा नहीं करते थे तो उनको “बिच्छू” घास लगा देते हैं । तो मुझे काफी हैरानी हुई सुनकर । सामान्य तौर पर कई साग-सब्जियां ऐसी होतीं है जिनसे कुछ देर को खुजली या जलन होती है फिर थोड़ी देर में ठीक भी हो जाती है पर ये तथ्य नया था मेरे लिए !

अगर यह पौधा किसी को गलती से भी लग जाए तो इसकी पीड़ा बिच्छू के डंक के काटने जैसी ही होती है इससे असहनीय जलन होने लगती है।शरीर में छोटे-छोटे लाल रंग के दाने होने लगते हैं तथा शरीर के उस हिस्से में सूजन भी हो जाती है जो कम्बल से रगड़ने तथा तेल की हल्की मालिश के बाद ह़ी खत्म होती है।

इसका नाम आपने कलर्स टी वी पर “छोटी सरदारनी “हिंदी सीरियल के 17 जनवरी 2020 की कड़ी में भी सुना होगामध्य हिमालय के उत्तराखंड में बसा पौराणिक मानसखंड कुमाऊँ मंडल तथा केदारखंड गढ़वाल मंडल उत्तराखंड के नाम से जाना, अपनी प्राकृतिक वन सम्पदा के लिये देश-विदेश में सदियों से प्रसिद्ध रहा है। रमणीक भूभाग में पाई जाने वाली हर वनस्पति का मानव के लिये विशेष महत्व एवं उपयोग है। इतिहास ही नहीं ” प्रत्यक्षं किम प्रमाणं ” के लिए आप स्वयं अपनी आँखों और दिमाग से देखिये कि यहां की समस्त वनस्पति जड़ी-बूटियां प्राचीन काल से ही मानव तथा जीव-जंतुओं की सेवा करती आ रही हैं।

सिंसुणा: बिच्छू घास को संस्कृत में वृश्चिक, हिन्दी में बिच्छू घास, बिच्छू पान एवं बिच्छू बूटी कहते हैं। सिसूण,सिन्न या सिसौण,सिंसुणा को गढ़वाल में कनाली-झिरकंडाली, अंग्रेजी में नीटिल प्लांट तथा लेटिन में अर्टिका कहते हैं। बिच्छू घास एक प्राकृतिक मल्टीविटामिन है।इसमें विटामिन A, C, आयरन ,कैल्शियम , मैग्नीज व पोटेशियम अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है।इसके अलावा कार्बोहाइड्रेट व एनर्जी तत्व भी पाये जाते हैं।कोलेस्ट्रॉल सबसे कम होता है तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।इसमें आयरन सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है

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मैदानी क्षेत्रों में बहुत कम पाया जाता है। गहरे हरे रंग के इस पौधे में छोटे-छोटे कांटे लगे रहते हैं।इसको छूने से जितनी अधिक पीड़ा होती है।उससे अधिक उससे बनने वाली चाय उतनी ही अमृततुल्य है। इसमें ऐसिटाइलकोलिन, हिस्टामिन ,5 -HT ,फोरमिक एसिड अत्यधिक मात्र में पाया जाता है जो छूने पर जलन का कारण बनते हैं।उत्तराखंड में जब बच्चे अपनी शैतानी से बाज नहीं आते हैं तो उनकी मां गुस्से में कहती है –

“तेर मनसा सिसूंण खांड़क ऐ रे” (मतलब तुम्हारी इच्छा बिच्छू घास खाने की हो रही है ?)

अपनी मां का यह वाक्य सुन बच्चे बिच्छू के डंक की तीव्र वेदना के भय से अपनी शैतानी तुरंत बंद कर शरीफ बन जाते हैं। इसका उपयोग चोरों से सच उगलवाने के लिये भी किया जाता है।

जाड़े के मौसम में उत्तराखंड तथा पड़ोसी देश नेपाल एवं तिब्बत के ग्रामीण निवासी इसकी स्वादिष्ट सब्जी को मड़वे की रोटी के साथ बड़े चाव से खाते हैं ।

उत्तराखंड में बटकुल अर्टकिसी के अंतर्गत बिच्छू की कुल तीन प्रजातियां पायी जाती हैं:

1- अर्टिका पारविफिलौरा: यह 2000 फीट से 12000 फीट तक के भूभाग में पायी जाती है। इसका पौधा चार से छः फुट तक का होता है। इसमें फूल फरवरी से जुलाई तक खिलते हैं।

2- अर्टिका डायोईका: यह 6000 फीट से 10000 फीट तक के भूभाग में बंजर जगह में पाया जाता है। इसकी औसत ऊँचाई तीन से छः फुट तक होती है, इसमें फूल जुलाई -अगस्त में खिलते हैं।

3- अर्टिका हायपरशेरिया: 15000 से 17000 फीट के भूभाग पर तिब्बत से लगी सीमा में पाया जाता है। इसमें फूल अगस्त में खिलते हैं।

इसी कुल की एक प्रजाति फ्रांसीसी वनस्पति शास्त्री के नाम पर गिरारडियाना-हिटरोफायला दूसरी तरह की बिच्छू घास है। यह 4000 फीट से 9000 फीट तक के नमी वाले भूभाग में छायादार जगहों में बहुतायत से पायी जाती है। इसके पौधे चार से छः फीट के होते हैं। इनमें फूल जुलाई-अगस्त में खिलते हैं। इसको हिन्दी में अलबिछुआ चीचड़, नेपाली में डाली, मराठी में मांसी खजानी व पंजाबी में अजल-धवल कहते हैं। इसके पत्ते सिर दर्द में और इसका क्वाथ बुखार में दिया जाता है।

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• कुमाऊं या गढ़वाल के स्थानीय लोग पहले इसका प्रयोग बच्चों को दंड देने, शराबियों की के लिए इसको पानी में भिगोकर ज्यादा असरदार बनाकर नशा उतारने में करते थे ।

जानवरों को चारे के रूप में दिया जाता है। जिससे दुधारू जानवर अत्यधिक मात्रा में दूध देना शुरू कर देते हैं।

•कभी कभी गांव के ही बड़े बुजुर्ग गठिया, बात, जोड़ों का दर्द, पित्त से संबंधित बीमारियों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।

• इसका स्वाद लगभग पालक के जैसा ही होता है और तासीर गर्म होती है। इसीलिये इसको चावल के साथ खाया जाता है।इसी लिए इसे “हर्बल डिश” भी कहा जाता है ।

• वर्तमान समय में इससे बनी चाय का अत्यधिक प्रयोग किया जाने लगा है।यह अमीरों की पसंदीदा चाय बनती जा रही है।इसे “हर्बल टी” का नाम भी दिया गया है।

•इससे चप्पल, शॉल , जैकेट, स्टाल, कंबल, बैग, आदि बनाए जाते हैं।

•इसका उपयोग घुटनों के दर्द, जोड़ों का दर्द, शरीर में कहीं भी मोच आ जाइए, पित्त से संबंधित बीमारी को दूर करने में किया जाता है।

• मलेरिया के बुखार में पेरासिटामोल से कई गुना अधिक कारगर है।

•बिच्छू घास के बीजों के सेवन से पेट साफ होता है।

•इसका प्रयोग आजकल कई सारी हर्बल दवाइयां बनाने के लिए किया जा रहा है।

•बिच्छू घास की खूबियाँ लोगों को पता लगनी शुरू हुई तो इसका प्रयोग औषधि रूप के अलावा अन्य कामों के लिए भी किया जाने लगा है।अचानक ह़ी बिच्छू घास का महत्व बहुत अत्यधिक बढ़ गया है।

•मलेरिया के बुखार में पेरासिटामोल की जगह बिच्छू घास से बनी हुई दवाई का प्रयोग करने हेतु शोध जारी हैं।हो सकता है कि भविष्य में पेरासिटामोल की जगह मलेरिया के बुखार को दूर भगाने के लिए हम बिच्छू घास से बनी भी दवा का प्रयोग करें।

ये ठण्ड के मौसम में शरीर को गर्म रखने में मदद करता हैं।भारत के कई शहरों जैसे-

दिल्ली,जयपुर,अहमदाबाद,कोलकाता ,मुंबई तथा गुजरात के अन्य हिस्सों व विदेशों में भी इसकी मांग बहुत अत्यधिक है।इससे बनने वाले चप्पल, शाल, जैकेट, स्टाल, कंबल, बैग बहुत ही ऊंचे दामों में बिकती हैं। उत्तराखंड में बिच्छू घास से बनने वाली चप्पलों की भारत के कई शहरों के अलावा विदेशों में भी बहुत अधिक मांग है।फ़्रांस,अमेरिका ,नीदरलैंड ,न्यूजीलैंड में इनकी जबरदस्त मांग है।

भीमल स्लीपर्स को फ्रांस से तकरीबन 10,000 जोड़ी स्लीपर्स के आर्डर मिले हैं। लेकिन लोगों को जानकारी के अभाव के कारण व उत्पादन कम होने से आपूर्ति पूरी नहीं हो पा रही है।इसीलिए फिलहाल 4,000 जोड़ी चप्पल की मांग को ही पूरा किया गया है।

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हालाँकि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में ऐसी कई संस्थाएं मौजूद हैं जो बिच्छू घास से बनने वाले उत्पादों को तैयार कर रही हैं और देश दुनिया का परिचय बिच्छू घास से बनने वाले उत्पादों से करा रही हैं।जैसे चमोली जिले में मंगरौली गांव में “रूलर इंडिया क्राफ्ट संस्था”, उत्तरकाशी में भीममल्ला में “नंन्दा उत्थान समिति” , अल्मोड़ा शहर के आसपास की कई संस्थाएं इसी क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।

पंचचूली शॉल (जो बिच्छू घास से ही बनती है) बनाने वाली एक एनजीओ इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं।जो उत्तराखंड की विरासत को समेटे हुए हैं।अब बिच्छू घास से बनी हुई चीजों को ऑनलाइन बेचने की भी तैयारी चल रही है फिलहाल इसकी बाताचीज अमेजॉन से चल रही है।

पर्वतीय इलाकों में इसका प्रयोग ज्योतिषीय उपयोग के लिए भी किया जाता हैं।इसकी जड़ का प्रयोग शनि देव की टेड़ी नजर के प्रकोप से बचने के लिए किया जाता हैं। इसकी जड़ का प्रयोग अन्य प्रकार के टोने टोटके के रूप में भी होता हैं। सिंसूण का प्रयोग उत्तराखंड में प्रेत आत्माओं एवं छल छिद्र भगाने में ओझा लोग करते हैं।बिच्छू घास से बनी औषधि लोगों को रोगों से बिना कोई नुकसान पहुचाये ठीक होने में मदद कर रही है

जिला उद्योग विभाग की योजना धरातल पर उतरी तो चमोली जिला बिच्छू घास से तैयार होने वाले कपड़ों में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकेगा। विभाग मिनी उद्योग केंद्र कालेश्वर में सामान्य सुविधा केंद्र विकसित कर यहां प्रशिक्षितों से हस्तशिल्प के उत्पाद तैयार करवाएगा। योजना का प्रस्ताव केंद्र और राज्य सरकार को भेजा गया है। योजना के तहत मफलर और अन्य कपड़े यहां तैयार किए जाएंगे।

उद्योग विभाग द्वारा कालेश्वर में नब्बे के दशक में मिनी उद्योग केंद्र की स्थापना की गई थी।डा. सजवाण ने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान मंगरोली गांव में बिच्छू घास से ग्रामीणों ने मफलर और अन्य कपड़े के उत्पाद तैयार किए, जिनकी बाजार में डिमांड अच्छी रही।

इसमें कैंसर को खत्म करने के गुण हैं, यही वजह है कि अब कंडाली के बीजों से कैंसर की दवाई बनाई जा रही है। कंडाली एक ऐसा पौधा है, जिसके हर हिस्से का इस्तेमाल होता है।

हमारे देश का हर प्रदेश ऐसे ही असंख्य रत्नों से लबालब है देर मात्र पहचान और पहल की है ।

जय हिन्द !

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