बेटी को जन्म देने का एक मां-बाप का दुख

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प्रभाकर अंतर्जातीय विवाह के खिलाफ नहीं पर धर्मपरिवर्तन के पक्षधर भी नहीं इसके दूरगामी परिणाम से भयभीत हैं । किससे कहें ? क्या और कैसे कहें ? कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा कि अपनी लगाई फुलवारी को बचा पाएं ! अपने बुढ़ापे के सहारे की आशा तो पहले भी नहीं की थी उन्होंने पर बेटी और बेटी की शादी को लेकर तो बहुत सपने सजाये थे दोनों ने वो सारे सपने छींके से गिरे फूल के वर्तन की तरह कूर -कूर हो गए ।

लोकेष्णा मिश्रा

अभी-अभी यामिनी आई सी यू से बाहर आई है ,दो महीने होने जा रहे हैं शहर के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में ,आई सी यू से कॉमन रूम ,कॉमन रूम से आई सी यू पति प्रभाकर को देखकर -छूकर घंटों उसके पास आँखों का समुद्र बहा कर चली आती है इसी उम्मीद में कि एक दिन प्रभाकर जरूर कोमा से बाहर आएंगे । तभी लीजिये आंटी जी मिठाई खाइये , मैं सुन्दर सी परी का बाप बन गया हूँ । पिछले दिनों भर्ती की गई एक महिला का पति बोला। यामिनी उसे बड़े गौर से देख रही थी ! कुछ इससे भी ज्यादा ख़ुशी उस दिन प्रभाकर के चेहरे पर थी । 25 साल पहले इसी अस्पताल में यामिनी की गोद में परीलोक से खिलते गुलाब की कली सी गुलाबी परी उतरी । प्रभाकर को तो जैसे तीनों जहांन की दौलत मिल गई हो । सारे अस्पताल में मिठाई बंटवाई , यामिनी की देखभाल करने वाली नर्स को एक साड़ी और मिठाई के डिब्बे के साथ नेग अलग से दिया । पूरे अस्पताल में प्रभाकर की दरियादिली के चर्चे हो रहे थे ।

माना कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का जमाना है पर फिर भी इतना तो आज तक किसी ने नहीं किया जैसा प्रभाकर सर ने किया है । एक नर्स बोली ।
हाँ सच कह रही हो ,ज्यादा पैसे वाले लोग भी इतना तो नहीं करते , जितना नौकरीपेशा होते हुए इन्होंने किया दूसरी नर्स ने कहा ।
सभी अपने-अपने हिसाब से प्रभाकर सर की वाहवाही करते नहीं थक रहे थे । जाते समय प्रभाकर बेटी बचाओ के नाम से एक गोलक रिसेप्शन पर 1000 रु डाल कर रख कर आये ।जिससे कि बेटी होने पर जरूरतमंदों की मदद हो सके । प्रभाकर ने मन ही मन खुद से एक वादा किया – मैं बेटी को ऐसे पालूंगा कि बेटी के नाम पर भ्रूणहत्या जैसे जघन्य अपराध करने वालों के लिए एक मिशाल बन सके । इसकी सारी इच्छाएं पूरी करूंगा और इसका भविष्य उज्जवल करने में कोई कसर नहीं रखूंगा । जितनी प्यारी बच्ची थी उतना ही प्यारा नाम चुना माँ-बाप ने स्निग्धा ।
उसकी खुशियों और जरूरतों के आगे प्रभाकर ने अपनी जरूरतों को भी दीवार में कील लगाकर टांग दिया था । कभी-कभी यामिनी कहती भी थी कि कुछ अपने लिए भी बचा के रखो , दोनों हाथ खाली करके कैसे चलेगा ?
यामिनी तुम क्यों परेशान होती हो , हमें करना भी क्या है ? हमारी बच्ची अच्छे से पढ़ लिख जाये अपने पैरों पर खड़ी हो जाये और एक प्यारे से राजकुमार के साथ उडऩखटोले में उड़कर राजमहल में जाये इससे ज्यादा और क्या चाहिए एक बाप को? मुझे आपकी इतनी आकांक्षाओं ,अपेक्षाओं से डर लगता है ।
अरे काहे का डर !
देखते नहीं आजकल के बच्चे कुछ भी करते हैं और ज्यादा कहने पर बुरा भी बहुत जल्दी मान जाते हैं ।
हमारी बच्ची ऐसी नहीं है , हमने कौन उसके पालने -पोषने में लाड़-प्यार की कमी की है । वो हमारी भावनाओं का सम्मान करती है और हमेशा करेगी ।
वक्त तो जैसे रॉकेट की गति से दौड़ रहा था । स्निग्धा अब 12वीं कक्षा में आ गई थी पढऩे में ठीक ही है 75-80 फीसद अंक आ ही जाते हैं । प्रभाकर ड्रोन के जैसे उसे अपनी नजरो के सामने रखना चाहते थे , बेटी के अहसास से खुद को हराभरा रखना चाहते थे । बेटी को ले कर पति-पत्नी में अक्सर कहा सुनी हो ही जाती थी ।
ऐसे ही एक दिन डैड मुझे 1000 रुपये दीजिये ना प्लीज । स्निग्धा ने अपने पिता के गले में बाहें डालते हुए कहा ।
अभी तो आज 20 तारीख ही है ? तुम्हारी पॉकेटमनी का क्या हुआ स्निग्धा ? यामिनी ने थोड़ा हैरान-परेशान हो कर कहा ।
मॉम वो आज एक फ्रेंड का बर्थडे है अपनी इज्जत का सवाल है ।
स्निग्धा बच्ची महीना खतम होने से पहले ही पॉकेटमनी खतम करना तुम्हारी आदत बन गई है , ये ठीक नहीं है ।
डैड देखो ना मॉम को !!!!!!!!!!!
ले तू जा और खुश रह प्रभाकर ने 500-500 के दो नोट बेटी को देते हुए कहा ।
देखो जी ये बहुत ज्यादा हो रहा है । इतनी ज्यादा दोस्ती भी अच्छी नहीं और मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं यूं लड़के-लड़कियों का स्कूल के बाद भी एकदूसरे के साथ घूमना-फिरना या पार्टी मनाना । यामिनी ने अपने मनोभाव व्यक्त किये ।
अरे यार ! ऐसा नहीं है आजकल के बच्चों के लिए ये सब सामान्य सी बातें हैं और अच्छा है वो कमसे कम सहज तो रहेगी सबके साथ ।
ऐसी ही बातों के साथ दिन उडऩे और रात भागने लगी । अब स्निग्धा बी टैक कर रही है । हॉस्टल में रहती है , घर आने का मन कम ही करती है । कभी एक्जाम कभी स्लेबस पूरा करने के बहाने आ ही जाते हैं । स्वतंत्रता कब उच्छृंखलता बन गई खुद स्निग्धा भी नहीं समझ पाई । कई बार हॉस्टल से वार्डन की शिकायतें मिलीं जिनको जैसे-तैसे बेटी के भविष्य की दुहाई दे कर प्रभाकर मामले को वहीँ रफा-दफा कर आता और यामिनी को आधा-अधूरा सच बता कर बात खतम कर देता ।
आखिर वो दिन भी आ गया जिसका माता-पिता को बेसब्री से इन्तजार था । आज बेटी घर आ रही है साथ ही उसे एक नामी कम्पनी से प्लेसमेंट भी मिला है । कुछ दिन घर रहेगी फिर जाएगी । आज पूरा घर जैसे बेटी के स्वागत में बाहें फैलाये खड़ा है । माँ ने उसकी पसंद के सारे व्यंजन बना डाले हैं पर मन के किसी कोने में बेटी की नापसंदी का भी डर है । उसके कमरे की साज-सज्जा देखते ही बन रही है सुर्ख गुलाबों की गुलाबीगंध से कमरा सराबोर है । घर में बिना किसी त्यौहार के उत्सव जैसा माहौल है ।
दरवाजे पर गाड़ी देख कर माँ की जान में जान आई , गाड़ी से उतरते ही माँ ने बेटी को गले लगाया पर ना जाने क्या बात थी कि माँ का मन ना भरा ।
मॉम बहुत थक गई हूँ थोड़ी देर आराम करूंगी । एक कप कड़क कॉफी पिलवा दो विद आउट शुगर स्निग्धा बोली
पर मैंने तो रात के खाने में तेरी पसंद की सारी चीजें बनाई हैं यामिनी ने थोड़े हताशा भरे लहजे में कहा ।
सॉरी मॉम कल खाऊँगी आज कुछ नहीं प्लीज प्रभाकर और यामिनी एकदूसरे को समझाने लगे । यामिनी ने देखा देर रात तक स्निग्धा के कमरे की लाइट जलती रही और टहल-टहल कर किसी से फोन पर बात भी करती रही । माँ का मन आशंकाओं के काले घने बादलों सा उमड़ता-घुमड़ता रहा । सुबह 8 बजे स्निग्धा कमरे से बाहर आई , आते ही अपने पिता से लिपट गई और नास्ता करते हुए बोली डैड मैं सोच रही थी कि जॉब पर जाने से पहले शादी भी कर लेती हूँ इससे बाहर रहने का खर्चा भी कम होगा और एक बार में सैटल भी हो जाऊँगी ।
प्रभाकर और यामिनी हैरानी से एकदूसरे की ओर देखने लगे और बोले
पर बेटा ………………………..!!!!!!!!!
हमने तो अभी लड़का देखना शुरू भी नहीं किया कैसे होगा सब ?
उसकी आप टेंशन मत लीजिये मैंने पहले से ही सब सैट कर लिया है , बस आपको बताना था । स्निग्धा ने कहा
पर बेटी कौन है वो ,उसके माता-पिता वगैरह ? प्रभाकर ने बड़े धीरज के साथ कहा ।
मेरा दोस्त है , उसका प्लेसमेंट भी मेरी ही कंपनी में मेरे साथ ही हुआ है , दानिश नाम है उसका ।
प्रभाकर के शरीर का तापमान माइनस में चला गया एकदम बर्फ के जैसा दिमाग भी जम गया समझ नहीं पाया कि गलती कहाँ और किस दर्जे की हुई !! यामिनी ने उसे सम्हाला
डैड पानी पीजिये ऐसा क्या कह दिया मैंने ? सब नॉर्मल ही तो है शादी तो करनी ही है मुझे । दानिश अभी दोपहर तक आ जायेगा आज ही कोर्ट जाना है फालतू का तमाशा नहीं करना है शादी के नाम पर सीधी कोर्ट मैरिज करेंगे हमलोग । सारी फॉर्मल्टी लगभग पूरी हो चुकी है बस दो चार दिन और लगेंगे । स्निग्धा ने बड़े ही आराम से एक ही झटके में अपनी बात कह डाली । एकदम फ्रेंडली !
अकेले अपनी लाइफ सैट करने के चक्कर में बेटी माँ-बाप के चेहरे और मन के भाव पढऩा ही भूल गई । प्रभाकर और यामिनी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? काफी सलाह मशविरा के बाद बेटी से बात की , कुछ समय माँगा अच्छा लड़का देख कर उसके हिसाब से शादी करने को , गुस्सा प्यार सब आजमाया पर कोई रास्ता नहीं निकला ।
आपलोग समझते क्यों नहीं आई लव दानिश ! और हमदोनों शादी करेंगे एनफ !
प्रभाकर अंतर्जातीय विवाह के खिलाफ नहीं पर धर्मपरिवर्तन के पक्षधर भी नहीं इसके दूरगामी परिणाम से भयभीत हैं । किससे कहें ? क्या और कैसे कहें ? कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा कि अपनी लगाई फुलवारी को बचा पाएं ! अपने बुढ़ापे के सहारे की आशा तो पहले भी नहीं की थी उन्होंने पर बेटी और बेटी की शादी को लेकर तो बहुत सपने सजाये थे दोनों ने वो सारे सपने छींके से गिरे फूल के वर्तन की तरह कूर -कूर हो गए । आखिरी रास्ता वकील और कोर्ट-कचहरी । गलत रास्ता तो वो सोच भी नहीं सकते थे सो वकील ने भी केस कमजोर बता दिया कि बेटी बालिग है रोकें भी तो कैसे ? कल बेटी शादी कर लेगी और वो यूं ही उसकी जिंदगी तबाह होते देखते रहेंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे । ये कौन से दौर से गुजर रहे हैं हम । ना जाने कैसी-कैसी बातें कर रहे थे दोनों एकदूसरे से । हताश होकर घर की ओर गाड़ी मोड़ दी थोड़ी दूर ही निकले थे कि देखा आगे जबरदस्त जाम था काफी देर बाद रास्ता खुला तो चौराहे पर देखा महिलाएं बड़े जोर-शोर से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे लगाते हुए चली आ रहीं थीं । आज इन दम्पति को ये नारे बेमाने से लग रहे थे । लग रहा था जैसे खुद इन्ही का जुलूस निकल रहा हो । प्रभाकर खुद को अपाहिज महसूस कर रहे थे अगले पल ही स्टेरिंग पर प्रभाकर का हाथ जैसे चिपक सा गया और सिर सीट से सट गया यामिनी कुछ समझ नहीं पाई वो आवाज पर आवाज लगाने में पर लग रहा था जैसे प्रभाकर के तो कान ही काम नहीं कर रहे अगले ही पल चेहरे के हाव-भाव देख कर यामिनी के होश उड़ गए वो वाबली सी गाड़ी से बाहर निकल कर मदद क लिए पुकारने लगी और आधे घंटे में प्रभाकर अस्पताल के बैड पर थे । काफी जांच-परख के बाद डॉक्टर ने पैरालिसिस का अटैक बताया जिससे कि वो कोमा में चले गए । कितने दिन महीने , साल लगेंगे या ठीक होंगे भी कुछ कहा नहीं जा सकता । डॉक्टर केवल इलाज और दिलासा दे पा रहे हैं वो भी नहीं जानते कि यामिनी इस व्यथासुरंग से कभी बाहर आएगी भी या नहीं ।
तभी अचानक आई सी यू के बाहर ही कुछ लोगों की करुण -चीत्कार के साथ यामिनी की बेहोशी टूटी और उसके पेट में भूकंप सा आ गया , आज फिर एक जिंदगी मौत के सामने घुटने टेक गई ।

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