Nashik की इन गुफाओं मे है कौतूहल ,शिल्प,आस्था की त्रिवेणी

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कु. लोकेष्णा मिश्रा

शारदीय नवरात्रि की अष्टमी – नवमी , महाराष्ट्र के प्रमुख धार्मिक एवं दर्शनीय स्थलों को दिल-दिमाग में उतारते हुए विजयादशमी की शाम के लगभग ४ बजे हैं । ढलता सूर्य भले ही विटामिन डी न दे रहा हो पर सुकून बेहद दे रहा है । टैक्सी वाले भैया ने नासिक मुख्यालय से ७-८ किमी पहले ही स्टेरिंग को विराम दे दिया । वहाँ की मिट्टी और हरियाली की मिली-जुली सुगन्धित हवाएं तन को सिंहराकर स्वच्छ ऑक्सीजन दिए जा रहीं हैं ।

पूरे दिन नासिक भ्रमण की थकान हम एक पल में उतार बैठे । हम खड़े हैं पांडवलेणी, पहाड़ की तलहटी से लगी सीढ़ियों के पास । ये हमारी यात्रा में अलग से जुड़ा पर अंतिम पड़ाव था, इंदौर की रात की ट्रैन थी हमारी सो टैक्सी वाले भैया ने ही सुझाया कि पांडवलेणी भी बहुत रोमांचक जगह है । भाई ने थकान की वजह से ज्यादा रूचि नहीं ली तो मैं ,भाभी और उनके दो बच्चे चल दिए । पर्यटन शुल्क ( टिकिट ) न के बराबर है इन अनूठी गुफाओं को देखने का । गुफाओं की सीढ़ियों पर नजर डाली तो केवल हरियाली और सीढ़ियां ही नजर आईं दूर तक ।

लगभग ५००, खूब चौड़ी आरामदायक कम ऊँचाई वाली सीढ़ियां हैं । थोड़ा चढ़ने के बाद ऊपर घुमावदार रास्ते पर आते-जाते लोग , आगरा मण्डल के रक्षाबंधन मेले की याद दिला रहे थे । सीढ़ियों पर एक ओर थोड़ी छितरी सी रेलिंग लगी थी दूसरी ओर घसोंधे ( घास की गंध वाले ) पहाड़ । मेरे साथ, बच्चे भी पूरे उत्साह और कुतूहल में थे आने वाली मंजिल के लिए । सीढ़ियों का विस्तार इतना है कि ४-५ लोग बिना एक-दूसरे को बाधित किये चढ़-उतर ले रहे थे । कहीं-कहीं पेड़ पहाड़ियों पर यूं झुके थे कि रात का सा आभास होने लगता था । रास्ते के प्रत्येक घुमाव पार लगे बोर्ड गुफाओं की पूरी जानकारी दे रहे थे ।

अभी हमलोग आधी दूरी ही तय कर पाए होंगे कि पहले से वह रही किशोरी -वयार अचानक अपने पूर्ण यौवन को पार कर आँधी में परिवर्तित हो गई । मैंने दोनों बच्चो के हाथ कस कर पकड़ रखे थे और उनसे हवा के रुख के विपरीत खड़े होने को कहा कि इतने में बरखारानी भी आ धमकी । आधे रास्ते से लौटना भी बुद्धिमता नहीं थी । कभी-कभी हम अपने लिए नहीं बल्कि “अपने अपनों की सलामती के लिए चिंतित होते हैं ” साहस डगमगाना भी लाजमी था एक नए राज्य के अनजान शहर में , पर स्थानीय लोगों ने खूब हौसला बढ़ाया सबका कि ऊपर पँहुचकर कर सारी परेशानी भूल जायेंगे , कोई डर वाली बात नहीं । हमें उनका भरोसा यूं भी था कि पिछले तीन दिनों से टैक्सी वाले भैया हमें बिना हॉर्न बजाये ही पूरे महाराष्ट्र दर्शन करते आएं हैं , हमने हॉर्न की आवाज सुनी ही नहीं कहीं सड़क पर , यहाँ सभी स्वयं नियंत्रित चल रहे थे । कुछ देर बाद आँधी-पानी सब थम गए । पेड़ों से पानी अभी भी छन-छन कर गिर रहा था पानी बिल्कुल पहाड़ों के जैसे ठंडा था । कुछ ही मिनट में हम अपनी मंजिल पर थे ।

ऊपर पहुँचते ही हम चारों एक स्थान ढूंढ कर एकदूसरे से सट कर बैठ गए । बच्चे अभी भी कुछ सहमे से थे । धड़कनें मेरी भी बढ़ीं थी । दिमागी कसरत और चढ़ाई की वजह से अब भूख का सा अहसास होने लगा था । स्थानीय लोग हल्की-फुल्की खाद्य -सामग्री लाए थे अपने साथ । हम रास्ते में उनकी इन थैलियों को मंदिर में चढ़ाने का प्रसाद समझ रहे थे जबकि मंदिर यहाँ है ही नहीं । खाने के नाम पर नितांत अस्थाई रूप से, उबली हुई मक्का , चने की दाल मिल रहे थे , कचरा करने की अनुमति यहाँ किसी को भी नहीं है ( ज्यों नैनीताल में झील के किनारे मूंगफली , भुट्टे आदि मिलना बंद हो गए हैं ) । महाराष्ट्र की सडकों की जैसी ही साफ-सफाई यहाँ भी थी ।

अब भाष्कर बदलियों से झाँकने लगा था । वहाँ के शांत ठन्डे वातावरण में घंटों ऐसे ही बैठे रहने का मन कर रहा था पर हमेशा मन का कहा नहीं किया जा सकता सो हम भी थोड़ा खाते-खाते गुफाओं को देखने के लिए चल दिए । पांडवलेणी का निर्माण १२०० वीं ईसवीं के समय किया गया है । भारत सरकार ने इसे ०३ अप्रैल १९१६ में ” राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक सम्मान ” दिया है । इसमें कुल २४ गुफाएं है । यहाँ के शिलालेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ तीन राजाओं का वर्चस्व था -पश्चिमी क्षत्रप ,सातवाहन और अविरास । सातवाहन और क्षत्रपों के बीच में वर्चस्व को लेकर अनबन थी फिर भी तीनों राजाओं ने मिलकर बौद्ध धर्म का समर्थन किया है । बाद में स्थानीय व्यापारियों , जमींदारों ने इसमें सहयोग किया है । अभी भी यहाँ पर भगवान बुद्ध की मूर्तियां हैं । ” पांडु ” पीले रंग के गांव या बौद्ध भिक्षुओं के पीले वस्त्र पहने की वजह से कहा गया है जो पाली शब्द है । इसी से “पांडव गुफा” नाम पड़ा , पुरातत्व विभाग द्वारा बताया गया कि इसे बनने में लगभग २०० वर्ष लगे ।

सह्याद्रि पर्वतमाला के इस पहाड़ का नाम ” त्रिरश्मि पर्वत ” भी है इन गुफाओं को “त्रिरश्मि गुफा” के नाम से भी जाना जाता है । गुफा के शिल्पकर्मियों ने एक ऐसा स्थान चुना जिसे रवि-रश्मियां दिनभर प्रकाशित रखतीं हैं स्थानीय निवासी इन गुफाओं को महाभारत काल और पांडवों के वनवास के समय का स्वयं निर्मित किया गया निवास स्थान मानते हैं । यहाँ से नासिक शहर का विहंगम दृश्य दर्शनीय है । गुफा वृन्द -गेट पर पहुँचते ही २४ अकल्पनीय गुफाएं दिखीं | गुफा नंबर ३ सबसे अच्छी स्थिति में है अभी तक । गुफा नंबर १७ में हाथियों की सवारी के नक्कासीदार चार खंभों का बरामदा है। गुफा नंबर २० के दरवाजे के सामने बरसाती झरना अभी भी गुफाद्वार के ठीक सामने गिर रहा था । गुफा में प्रकाश की कोई कृत्रिम व्यवस्था नहीं है । वहाँ जा कर भी ८-१० सीढ़ियां हैं कई जगह चढ़ने के लिए पर सावधानी हटी दुर्घटना घटी। किसी-किसी गुफा के अंदर जाने के लिए काफी हिम्मत जुटानी पड़ी । कोई उससे भी ज्यादा डरावनी लगी । चौकीदार ने ऐसी कई गुफाओं को टॉर्च और मोबाईल की लाइट के सहारे हमें दिखाया । बौद्ध प्रतिमाओं के अतिरिक्त अनेकों प्रतिमाएं हैं जिन्हे पांडवों से जोड़ के जाना जाता है ।

ज्यादातर गुफाओं की छत पर गुच्छेनुमा घास उगी है जो गमले में लगे पौधों का भ्रम पैदा कर रही है । कहीं-कहीं हरे-भरे पेड़ भी खड़े हैं जिन्हें देखकर उनके पोषित होने पर आश्चर्य होता है कि कैसे ये पत्थरों का सीना चीर कर अपना अस्तिव बनाये हुए हैं ?

नक्काशीदार, चिकनी सीढ़ियां, खम्भे , छज्जे आदि पहाड़ को काट कर बने हैं । कहीं स्याह काला रंग कहीं बादामी कहीं , एकदम पीली, कहीं धुमैले रंग की पहाड़ियां हैं । ऐसा लगा मानो उन शिल्पकारों के हाथों और मस्तिष्क में स्वयं विश्वकर्मा समाये हों जो इतनी विशाल -अद्भुत गुफाएं तैयार हुई हैं । दो दिन पहले देखी एलोरा गुफाओं से कहीं कमतर नहीं । किसी स्थान को पांचाली की रसोई ,कहीं पांडव भाइयों के अस्त्र-शस्त्र, शयनकक्ष , स्नानागार , विचार-विमर्श का स्थान आदि के रूप में जानते हैं । पत्थर जितना ऊबड़ -खाबड़ है उतना ही चिकना और चमकीला भी, इतने वर्षों के मानव पद- चिन्हों की गवाही देता और हम जैसे नवागंतुकों का विशाल भुजाएं फैलाए स्वागत करता प्रतीत होता है ।

अब चौकीदार सीटी बजाकर गुफा को बंद करने का संकेत करने लगा है उधर अस्ताचल दिवाकर की बाट जोह रहा है सो नीचे जाने की वाध्यता थी वरना गुफाओं को ठीक से देखने के लिए कम से कम ३-४ घंटे तो मिलने ही चाहिए । उतरते समय मेरा राष्ट्राभिमान चरम पर था और मैंने स्वयं को अतिधन्य समझा कि मेरा भी जन्म इस विशाल भारतवर्ष में हुआ जिसमें असंख्य अद्भुत चकित करने वाली धरोहरें जहाँ-तहाँ चुपचाप अपने निर्माण की गाथा कह रही हैं ।

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