शिवाय रूपी कृष्ण हों तो द्रोपदी का चीरहरण नहीं होगा

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लोकेष्णा मिश्रा, हल्द्वानी

  • रुद्रा का जह फोन नहीं लगा तो, शिवाय से ढंूढने को कहा, क्योंकि मैरिज होम की हद वही जानता था। इसी बीच मैरिज होम के एक हिस्से पर नजर पड़ी तो उसमें देखा कि कुछ नरगिद्द उस मासूम को नोचने की फिराक में हैं ….

‘ दादी मै भी चलूँगी तेरे साथ Ó
कहाँ चलेगी तू मेरे साथ ?
जहाँ तू जा रही है ,
तुझे कहाँ ले जाऊँगी उतनी दूर , स्कूल का क्या होगा ?
मै आ कर सब काम पूरा कर लूँगी
ओ दुलहिन ! समझा इसे क्या करेगी मेरे साथ ,अच्छे कपड़े भी नही है इसके पास
माँ ने हाँ कह दिया है
ईज़ा तो ले जा ना इसे फिर ये घड़ी आए ना आए, इसी बहाने देख लेगी शहर की चकमक , रुद्रवंती की माँ बोली
तू लाटी हो गई है ! इतनी दूर ले जाता है कोई लड़की को ?
ना ले जाता हो कोई , पर भंडारी जी बहुत अच्छे हैं , जब भी गांव आते हैं कुछ ना कुछ लाते ही हैं रुद्रा और खीमानंद के लिए वो तो है उन्हें अपनी मिट्टी अभी भी लुभाती है । मेरी कला को हमेशा मान दिया है उनके परिवार ने फिर !
ठीक है ले जाऊँगी , खुश रुद्रवंती की दादी गिदारिन हैं । बड़े बेटे की शादी में गई थी भागीरथी ,अब बेटी की शादी है । बड़े दिल वालों के लिए मीलों का क्या गिनना । यूँ तो शहर में भी कमी नही गिदारो की । सब पढ़- लिख गए हैं सो कामचलाऊ रीति-रिवाज शहर के लोग ही निभा लेते हैं किताबों से पढ़ कर । ब्राह्मण गिदार पुराने जमाने की बातें हैं । मैरिज होम और वेडिंग प्लानर ने सबको एक जैसा बना दिया है । कोई नियम कानून विवाह के बेतहाशा खर्चे पर लगाम लगा पाए ये तो समय के गर्भ में है । अब तो शादी की रजत और स्वर्ण जयंती में शादी के दबे हुए ख्वाव पूरे जोश से सामने आते हैं। डीजे के आगे लोकसंस्कृति भी आलों के साथ खत्म होती जा रही है । अकेली इस कला से गुज़ारा नही वरना रुद्रा पर बड़ी कृपा है वाग्देवी की ।
यूँ तो 75 होली, सावन देख चुकी है भागीरथी पर खाने में नमक-चीनी उसी की कला की बदौलत है । रुद्रा के दादा जी को गुजरे उतने ही साल हो गए जितने की रुद्रा है । एक टुकड़ा जमीन है, सो बेटा उसी को जोतता -बोता है । आज भी बहुत से ब्राह्मण सुदमा ही हैं ।
भोर के साथ रुद्रवंती के सपने दिवाकर से चमकने लगे । स्टेरिंग और पहियों के साथ भागीरथी ने ख़ुद को जोड़ दिया । मन के किसी कोने में नारीभय भी है । रुद्रवंती अभी 11की है पर जानवरों से ज्यादा डर आदमियों का है । औरत जात होना काफ़ी है उम्र और हाड़ -मांस अपने आप रहता है ।अब बिना सींग और बिना डरावने राक्षस होने लगे हैं जो नारी जाति पर यूँ झपटते हैं जैसे बन्दर खाने के सामान पर झपटते हैं बिना किसी डर के । गाहे-वगाहे एनजीओ वाली बहनों से सुना है भागीरथी ने ये सब । उसका गांव तो मान-मर्यादा वाला छोटा सा परिवार है ।
रुद्रवंती का मन तो रात दो बजे के जिओ के नेटवर्क की स्पीड सा दौड़ रहा है । वहाँ का घर , सामान, लोग आज वह उपत्यिकाओं से निकल कर शहरी मैदानों में खेलेगी । बसस्टेंड पहुँच कर भागीरथी ने पीसीओ से फोन कर दिया सो ड्राइवर गाड़ी ले कर आ गया था । सबकुछ टीवी और किताबों जैसा , रात होने पर भी लग रहा जैसे सूरज उसके बालों में टका हो । घर में घुसते ही रुद्रवंती की पलके पुतलियों पर आने को राज़ी नहीं थीं । दादी का हाथ जोर से हिलाते हुए बोली
देख दादी देख ! दीवारें कितनी रंगीन है !
हाँ देख रही हूँ
देख ! देख ! उस दीवार पर तो अपने गांव के पहाड़ , गूल ,नौले , गदेरे सब बने है !
दादी को एक तरफ़ खींचते हुए , वो देख छत पर काँच का कितना बड़ा गुलदस्ता है जो गिरा तो तू तो गई काम से ! और खी- खी करके हँसने लगी
मैंने सब पढ़ रखा है ये
तभी आई तू जिद करके
फिर
खाने में क्या-क्या खाया नाम रुद्रा को भी नहीं पता । कमरे , स्नानघर , पूजाघर देखते-देखते बरामदे में जमीन पर ही सो गई । अगले दिन सुआल पथाई के दिया से शगुन आखर की शुरुआत हुई । रुद्रा देख रही थी कि इस शीशमहल के लिए दादी अपने हुनर की पोटली में से क्या निकालेगी । सब देखते रह गए उसकी इस उमर का जोश । वरना यहां तो 50 तक बीपी, डाइबिटीज सब मेहरवान हो जाते हैं ।एक दिन बाद बारात आने को है । अब एक-एक रसम, रीति-रिवाज रच-रच के करने का बच्चों पर समय नही , सब यहीं के हिसाब से करना है । यहां का महिला संगीत इतने में तो गांव में 10शादियाँ हो जाएँ !
देख दादी ! मेरा सलवार -कमीज बहू जी ने दिया
यो तो भल लग री
चप्पल नही देखी तूने , ये कंगन देख
इतना क्यों कर रहीं हैं बहू जी आप ? भागीरथी की आँखें छलक गईं
तो क्या हुआ आमा ये भी तो बच्ची है देखो तो कितनी खुश है भंडारी जी की पत्नी ने कहा ।
मैं तो पहचान भी ना पाई ! नजर ना लगे आज ही जानी हूँ कि मेरे घर भी जादू की परी जन्मी है
रुद्रवंती दादी की गोद में सिर रखकर बोली मैंने सोच लिया कि पढ़ाई -लिखाई के साथ तेरी इस कला को इन्हीं शहरों में लाऊँगी और अपने पहाड़ का नाम दूर-दूर तक फैलाऊँगी, और खिलखिलाकर बाहर की ओर दौड़ गई ।
रास्ते में भंडारी जी का छोटा बेटा शिवाय अपने दोस्तों के साथ आ रहा था रुद्रा उड़ती तितली सी उससे जा टकराई ! उसने रुद्रवंती को सम्हाला और पूरे अधिकार से बोला
क्या रे रुद्रा कहाँ दौड़ी जा रही है गांव साबुत जाना है कि नहीं ?
रुद्रा दो -तीन दिनों में सबसे घुलमिल गई थी सो बोली
दद्दा देख लो पूरी जाऊँगी तुमने बचा लिया ना मुझे
हाँ -हाँ ठीक है पर मेनगेट से बाहर मत जाना शिवाय अपने काम में लग गया पर उसके दोस्त रुद्रवंती के पैरों के निशानों पर नजर गड़ाये रहे ।
बारात ,पूजा-पाठ, खाना-पीना सब होने के बाद फेरों के समय अचानक भागीरथी को लगा कि रुद्रा दिखाई नहीं दे रही कहीं । कहाँ गई होगी ? इधर-उधर देखा घर के सब लोगों से पूछा । सब यही कह रहे कि अभी तो यहीं थी ।
उधर शिवाय अपने दोस्तों को ढूँढने में था । जब उसे रुद्रवंती के गुम होने का पता चला तो याद आया कि उसने ही तो रूद्रा को अपने दोस्तों के साथ अन्दर भेजा था। पर अब दोनों का मोबाइल स्विच ऑफ आ रहा था । गाडिय़ां भी वहीं खड़ी थीं । मैरिजहोम की हद शिवाय जनता था । सो खोजते-खोजते देखा कि कच्ची कली को नरगिद्द नोचने -मसलने की फिराक में है । शिवाय ने दोनों को जोर का धक्का दिया और रुद्रा चीखते हुए शिवाय से चिपक गई ।
कोमल मन दरकने से बच गया मन ही मन शिवाय ने सोचा , इन दोस्तों से तो शादी के बाद निबटूंगा ।
भागीरथी तो बेहाल थी कि क्या मुँह दिखयेगी बहू बेटे को । तभी शिवाय के साथ रुद्रवंती को देख कर प्राण हरे हो गये । सोचा चलो शहर की चकाचौंध इस बार तो लानत-मलानत से बच गई।
थक गई थी सो , सो गई थी बगीचे में , अब इसे अपने साथ ही रखना भागीरथी को सब समझ आने लग गया ।
अगले दिन बहू जी ने ढेरों उपहार देकर शिवाय के साथ गाड़ी से विदा किया भागीरथी को रुद्रवंती के लिए माफी माँगी ।
भागीरथी बोली, ना बहू जी आप माफी क्यो मांगती है , जब तक शिवाय रूपी कृष्ण हैं, दुनिया में तब तक रुद्रवंती जैसी द्रौपदी का चीरहरण नहीं होगा न ही ये खुद कोई वो ,दिल्ली में क्या नाम ?…….. हाँ निर्भया के साथ हुआ वैसा कुछ करेंगे । जो जीती रही तो शिवाय की शादी में बिना बुलाये रुद्रवंती के साथ आ कर शगुन आखर मैं ही गाउंगी ।

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