corona virus : बेटे को चार कंधे भी नसीब न करा सका बदनसीब बाप

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corona virus update ​​​​​दुनिया के हर पिता की यही चाहत होती है कि वह अपने बेटे के कंधे पर श्मशान तक जाए, लेकिन कुछ बदनसीब बाप ऐसे भी होते हैं। जिन्हें बेटे को ही कंधा देना पड़ जाता है। कुदरत से मिले इस दर्द को लेकर न जाने कितने लोग दुनिया में जिंदगी का सफर काट रहे हैं, लेकिन पानीपत के एक पिता के साथ जो हुआ। वह सदियों तक इस गांव ही नहीं जिले के लोगों के हृदय को कचोटता रहेगा। कोरोना के संक्रमण का शिकार हुए बेटे के पिता की मजबूरी ऐसी थी कि वह उसके लिए चार कंधें भी नहीं जुटा सका। श्मशान घाट पर भी बुजुर्ग कंधों ने बड़े बेटे के साथ मिलकर किसी तरह लाडले को चिता तक पहुंचाया। इस बीच पिता ने यह भी कहा कि कोई अगर हर कदम के रुपये लेना चाहे तो हम देने को तैयार हैं, लेकिन कोई तो बेटे को कंधा दे दो। ऐसा नहीं था कि वहां लोग इस परिवार के साथ खड़े नहीं होना चाहते थे, लेकित तबाही साथ लेकर चल मौत के इस वायरस ने उनके पैरों में बेडिय़ां डाल दी। कुछ युवाओं ने हिम्मत भी जुटाई तो पास खड़े लोगों ने यह कहकर उनका हाथ थाम लिया कि क्यों मौत अपने घर ले जाने पर तुले हो। आखिर में मजबूर पिता ने अपने बड़े बेटे के साथ ही शव को श्मशान घाट तक पहुंचाया।
दरअसल पानीपत के सेक्टर 13-17 के 28 वर्षीय युवक की मौत के बाद कोरोना के संक्रमण की आशंका में अस्पताल स्टाफ ने भी चिता से दस मीटर की दूरी पर ही शव वाहन को खड़ा कर दिया था, जबकि सौ मीटर की दूरी पर लोगों को रहने की हिदायत दी गई थी। ऐसे में किसी से मदद नहीं मिलने पर पिता ने शव को बेंच पर रखा और फिर दोनों ने शव को उठाकर चिता तक पहुंचाया।

भाई की चिता को आग न देता तो जिंदगी बोझ बन जाती
मृतक युवक के बड़े भाई ने रोते हुए कहा कि पहला कदम बढ़ाने के साथ ही जिस छोटे भाई के हर कदम का मैने साथ दिया। उसे भला आखिरी सफर में मौत के डर से अकेला कैसे छोड़ देता। उसकी चिता को अगर आज आग नहीं देता तो जीवन भर यह बोझ लेकर जी नहीं पाता। हालांकि संक्रमण के खतरे को देखते हुए पिता-पुत्र को फिलहाल क्वारंटाइन कर दिया गया है।

पिता बोले-भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाए
खौफ इतना था कि शव वाहन अंदर नहीं जाने दिया। इसके बाद डॉक्टरों ने पिता को किट पहनाई। उन्होंने ही शव को नीचे उतारा। एसआइ ने भी दूर से बयान देने की नसीहत दी। रोते हुए पिता बोले कि भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाए। अंतिम बार बेटे का चेहरा तक नहीं देख पाया। कोई रिश्तेदार तक नहीं पहुंचा। यही नहीं पंडित भी अंतिम संस्कार के लिए तैयार नहीं हो रहा था। ऐसे में बहुत समझाने बुझाने के बाद कई मीटर की दूरी से एक पंडित ने अंतिम संस्कार की विधि को पूरा कराया।

 

 

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