citizenship amendment bill में यह है खास बात, जिसके लिए मचा पड़ा है बवाल

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  • सर्वेश कुमार
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मोदी सरकार ने विपक्ष के जबर्दस्त विरोध के बावजूद आखिर citizenship amendment bill (नागरिकता संशोधन विधेयक ) को लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में पास करा लिया है, अब राष्ट्रपति की मुहर के साथ ही यह इस विधेयक का संशोधित कानून देश में लागू हो जाएगा। इसके लेकर राजधानी दिल्ली से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों तक राजनीतिक दलों के इशारे पर सियासी हो-हल्ला मचा हुआ है। ऐसे में आम जनता का यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर यह बिल है क्या। क्या वास्तव में इस बिल से मुसलमानों के अधिकारों का कोई क्षति पहुंच रही है या फिर यह सिर्फ सियासी शिगूफा है। ।
दरअसल इस केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा था कि नागरिकता संशोधन बिल मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके बाद ही सियासी दलों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। हालांकि, प्रधानमंत्री NARENDRA MODI की गैर मौजूदगी में सरकार नेतृत्व करते हुए Amit Shah ने इस बिल को पहले लोकसभा और फिर 311-80 मतों से राज्य सभा में पास करा दिया। इस बिल के तहत नागरिकता प्रदान करने से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया है। नए नियम के मुताबिक अवैध प्रवासियों को अब बिना किसी दस्तावेज के ही भारत की नागरिकता मिल सकेगी।
नौ दिसंबर को राज्य सभा के पटल पर रखे जाने के बाद इस विधेयक पर 12 घंटे से भी अधिक समय तक बहस चलती रही। विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा कि नागरिकता संशोधन विधेयक 1950  नेहरू लियाकत समझौते की गलती को सुधारने के लिए लाया गया है। इस बिल के लागू होने से नागरिकता प्रदान करने से जुड़े जरूरी नियमों में बदलाव किया जा सकेगा। वहीं अवैध प्रवासियों को बैगर दस्तावेज के ही भारत की नागरिकता मिल सकेगी। यहां यह भी बता दें कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बिल को सदन में पेश किया था, लेकिन संख्याबल की कमी के चलते विपक्ष ने इसे पास नहीं होने दिया था। यही नहीं भारी विरोध के साथ इस बिल के माध्यम से सरकार पर धार्मिक भेदभाव का आरोप भी लगाया था।

आखिर नागरिकता संशोधन विधेयक में क्या है
नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर जिस तरह से देश में बखेड़ा खड़ा किया जा रहा है, ऐसे में इस बिल में किए गए संशोधन को समझना बेहद जरूरी है। वास्तव में इस बिल में मोदी सरकार ने नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन  किया है, जिसमें अब बांग्लादेश (Bangladesh), अफगानिस्तान (Afganistan) और पाकिस्तान (Pakistan) से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के शरणार्थियों हेतु नागरिकता के नियमों को आसान बनाया गया है। इस बिल संशोधन का मुख्य उद्देश्य चुनिंदा श्रेणियों में अवैध प्रवासियों को छूट दी गई है। दरअसल अभी तक किसी भी व्यक्ति को भारत की नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल यहां रहना अनिवार्य था, लेकिन इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल करना है। यानी इन तीनों देशों के छह धर्मों के लोगों को बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को भारतीय नागरिकता मिल सकेगी।

विधेयक को लेकर इसलिए खड़ा हुआ है विवाद
विधेयक को लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां जबर्दस्त विरोध हो रहा है, वहीं सियासी दल भी शोर मचा रहे हैं। एआइआइएम ने इसे रद किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्र्ट में याचिका भी दाखिल की है। दरअसल, इस बिल में मुस्लिम समुदाय को छोड़कर अन्य छह समुदायों को नागरिकता देने में राहत दी गई है। विपक्षी दलों के विरोध का यही सबसे बड़ा कारण है। उनका कहना है कि विधेयक में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है और यह बिल संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो समानता के अधिकार की बात करता है।

अवैध प्रवासी कौन हैं और इन्हें कैसे मिलेगा लाभ
नागरिकता कानून, 1955 के अनुसार अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है। अवैध प्रवासी वह लोग हैं, जो पासपोर्ट और वीजा के बिना ही भारत में घुस आए है और यहां रह रहे हैं। लेकिन इस संशोधित बिल से उन सभी लोगों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी जो छह साल से यहां रह रहे हैं। इसके साथ ही भारत के अन्य नागरिकों की तरह यह लोग भी तमाम सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

सियासी दलों में क्यों है टकराव और भाजपा को क्या होगा लाभ
नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों के बीच सियासी टकराव की दरअसल सबसे बड़ी वजह मतों का ध्रुवीकरण है। इस पूरी सियासत को समझने के लिए हमें लोकसभा चुनाव से थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। दरअसल उस समय भारतीय जनता पार्टी ने एनआरसी का मुद्दा उछाला था। इसे लेकर विपक्षी दल जैसे-जैसे शोर मचाते गए हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ होता चला गया। एनआरसी का सबसे ज्यादा विरोध पश्चिम बंगाल और असम में हुआ था, जहां भाजपा को सबसे ज्यादा लाभ हुआ। पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली जैसे प्रमुख राज्यों में अगले साल चुनाव होने हैं, ऐसे मे भाजपा ने एक बार फिर अपने तय एजेंडे के तहत नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये सियासी जमीन को खाद पानी दे दिया है। नतीजतन कांगे्रस सहित अन्य विरोधी दल हंगामा खड़ा कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हो सकता है, क्योंकि हिंदू वोटबैंक का ध्रुवीकरण यदि भाजपा की तरफ होता है तो ममता को सरकार बचाना मुश्किल हो जाएगा।

सर्वेश कुमार, अभिकर्ता भारतीय जीवन बीमा निगम
मोबाइल नंबर – 9336240299

 

 

 

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